1920 हॉरर्स ऑफ द हार्ट
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म '1920 : हॉरर्स ऑफ द हार्ट' की कहानी मेघना नाम की एक लड़की के इर्द -गिर्द घूमती है, जो अपने इक्कीसवे जन्मदिन पर अपने पिता धीरज को अपने बॉयफ्रेंड अर्जुन के बारे में बताने का फैसला करती है। तभी उसको पता चलता है कि उनके पिता ने आत्महत्या कर ली है। मेघना जैसे ही अपने पिता के मौत की तह में जाने की कोशिश करती है, उसे पता चलता है कि उसकी मां राधिका न केवल अतीत में उसे छोड़कर चली गई थी, बल्कि उसके पिता के मौत की जिम्मेदार भी है। मेघना अपने पिता की आत्मा उपयोग करके राधिका और उसके नए परिवार को बर्वाद करने की योजना बनाती है, लेकिन तभी उसे पता चलता है कि जो सच्चाई वह जानती हैं, असल में वह एक अधूरी कहानी है और तभी कहानी में एक नया मोड़ आता है।
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1920 हॉरर्स ऑफ द हार्ट
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कृष्णा भट्ट ने निर्देशक की बारीकियां अपने पिता विक्रम भट्ट से ही सीखी हैं। आम तौर होता क्या है, जब भी कोई निर्देशक अपने करियर की शुरुआत करता है तो उसकी कोशिश ऐसी रहती है कि ऐसी फिल्म का चुनाव करें, जिसमें पिता या फिर जिससे निर्देशन की बारीकियां सीखी है,उसकी छवि सिनेमा में न दिखे, तभी निर्देशक के तौर पर खुद की एक अलग पहचान बन पाती है। फिल्म '1920: हॉरर्स ऑफ द हार्ट' का नाम विक्रम भट्ट के ही निर्देशन में बनी फिल्म '1920' से लिया हुआ नाम है। पहली उत्सुकता तो यही पर खत्म हो जाती है। रही बात फिल्म के मेकिंग की, तो विक्रम भट्ट की पिछली अगर कुछ फिल्मों को देखें, तो उन फिल्मों का जो कलेवर, सेट डिजाइनिंग और विजुअल इफेक्ट रहे हैं, वैसे ही इस फिल्म में भी नजर आते हैं। कहानी भी ऐसी कुछ खास नहीं, जो दर्शकों को अपील कर सके।
1920 हॉरर्स ऑफ द हार्ट
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कहने को तो यह हॉरर म्यूजिकल फिल्म है। लेकिन फिल्म में अगर लोरी वाले गीत को छोड़ दें, तो ऐसा कोई गीत नहीं जो दिल को छु सके। महेश भट्ट और विक्रम भट्ट की फिल्मों से इतनी तो उम्मीद रहती ही है कि फिल्म में गाने जरूर अच्छे होंगे। लेकिन संगीत में भी यह फिल्म खरी नहीं उतरती है। महेश भट्ट न सिर्फ उम्दा डायरेक्टर हैं, बल्कि कलम के बहुत बड़े जादूगर भी रहे हैं। फिल्म में कुछ किरदार ऐसे आते हैं, जिसको पूरी तरह से जस्टिफाई नहीं किया गया है। मसलन, अमित बहल के ही किरदार को ले लें। उनकी फिल्म में राहुल देव के परिवार के साथ क्या दुश्मनी है, वह क्यों षड्यंत्र में शामिल होते हैं,ऐसे कुछ और किरदार हैं। कहानी में उसकी क्या उपयोगिता है समझ में नहीं आती है। फिल्म में चाहे छोटा किरदार हो या फिर बड़ा किरदार, उसका प्रॉपर इंट्रोडक्शन होना चाहिए ताकि कहानी में उसकी उपयोगिता क्या है, इस बात को दर्शक अच्छी तरह से समझ सकें।
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अब दूसरी बात आती है फिल्म की कास्टिंग पर। चरित्र अभिनेता तो अपने किरदार को निभा ही लेते हैं, लेकिन दर्शकों को उम्मीद फिल्म के लीड एक्टर्स से ज्यादा होती है। छोटे पर्दे के धारावाहिक 'बालिका वधु ' में आनंदी का किरदार निभाकर छोटे पर्दे की स्टार अभिनेत्री अविका गौर इससे पहले साउथ की कई फिल्मों में काम कर चुकी है। इस फिल्म में उनके परफॉर्मेंस को देखकर बहुत निराशा हुई है, पूरी फिल्म उन्ही के कंधे पर है और उनका ही कंधा कमजोर पड़ गया। तो समझ लीजिए फिल्म कहां जा रही है। एक अभिनेत्री का जो स्टारडम होता है,वह उनके अंदर इस फिल्म में नहीं नजर आया। डरने, चीखने- चिल्लाने के अलावा भावनात्मक दृश्यों को उन्होंने अच्छे से निभाने की कोशिश तो की, लेकिन अविका गौर बनकर। अभी भी छोटे पर्दे का असर उन पर हावी है। खुद को फिल्मों में एक अभिनेत्री के तौर पर स्थापित करने के लिए अभी उनकी बहुत ज्यादा मेहनत करने की जरूरत है। फिल्म में अविका गौर के बॉयफ्रेंड अर्जुन का किरदार दानिश पंडोर ने भी काफी निराश किया। हां, अविका के सौतेली बहन के किरदार में केतकी कुलकर्णी का अभिनय देखने लायक बनता है।