अमर उजाला संवाद में राकेश बेदी
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आज 24 जून को अमर उजाला का वैचारिक कार्यक्रम 'संवाद' देवभूमि उत्तराखंड में आयोजित हुआ है। यहां दिग्गज अभिनेता राकेश बेदी भी पहुंचे। वे सिनेमा की दुनिया में पांच दशक से सक्रिय हैं। फिल्में, टेलीविजन सीरियल, ओटीटी सीरीज में अपनी अदाकारी का दमखम दिखाने वाले राकेश बेदी ने रंगमंच से अपना सफर शुरू किया था और आज भी जारी है। संवाद में उन्होंने थिएटर के दिनों का एक मजेदार किस्सा साझा किया।
चश्मे बद्दूर में राकेश बेदी
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खुद नाटक के पोस्टर चिपकाया करते थे अभिनेता
कार्यक्रम में राकेश बेदी ने अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताया, 'कई रंगकर्मी इस बात को समझेगे कि आज वो दौर है जब आप अखबार में इश्तेहार दे सकते हैं। सोशल मीडिया पर पोस्टर डाल सकते हैं पर पहले ऐसा नहीं था। पहले हम पोस्टर छपवाते थे। दिल्ली की सर्द रातों में स्कूटर पर अपने दोस्त के साथ निकल जाते थे। एक हाथ में ब्रश होता था और दूसरे में लेही, जिससे हम वो पोस्टर चिपकाते थे। फिर शहर में खाली दीवारें ढूंढते थे जहां-जहां पोस्टर चिपकाने हैं।'
'पुलिस ने समझ लिया था आतंकवादी'
राके बेदी ने बताया, 'हमारा एक नाटक था 'जहर'। एक रात हम उसके पोस्टर चिपका रहे थे। तब मेरी लंबी-लंबी दाढ़ी थी। वहां से पुलिस गुजरी तो उन्होंने टॉर्च मारी। पोस्टर और मेरा हुलिया देखकर उन्होंने मुझे आतंकवादी समझ लिया कि ये बाहर से आए हैं और इनका कोई प्रोपेगेंडा है। उन्होंने बोला कि आप जहर घोल रहे हैं समाज में। हमने कहा कि नहीं ये नाटक है हमारा। इसमें टिकट की डिटेल भी हैं। उन्होंने बोला कि अगर नाटक है तो करके दिखाओ। फिर हमने पुलिस वालों को वह नाटक करके दिखाया, तब पुलिस ने हमें छोड़ा।'
अमर उजाला संवाद में राकेश बेदी
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आर्थिक तंगी और मुश्किल हालातों का सामना कैसे किया?
कार्यक्रम में राकेश बेदी ने अपने जीवन का वो किस्सा भी साझा किया जब वो डिप्रेशन में थे पर फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। एक्टर ने कहा, 'सबकी जिंदगी में ऐसा दिन आता है। मैंने यह बात कम मंचों पर बोली है। एक दिन मेरी जिंदगी में ऐसा आया कि काम नहीं था और पैसे भी नहीं थे। मैंने लेकिन एक बात तय की थी कि अपनी मजबूरियां परिवार तक नहीं जाने दूंगा। मेरी मां घबरा जाती कि मेरा बेटा रात को भूखा सोया। वापस बुला लेगी घर। मुझे वापस नहीं जाना। ऐसा वक्त आया कि बैंक भी खाली। घर भी खाली। सिर्फ 50 पैसे थे। तब 50 पैसे के छह केले आते थे। मैंने सोचा कि सबसे पहले तो यह तय करूं कि जरूरी क्या है? आज की भूख या करियर? मैंने छह केले खाए और सो गया कि कल का कल देखेंगे।'