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इंटरव्यू: फिल्म 'ओम का हरि' पर क्या बोले रघुबीर यादव? बताया बेटे के साथ कैसे हैं रिश्ते, कहा- पिता ने पीटा

Wed, 30 Sep 2026 06:00 AM IST
सिराजुद्दीन एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

Raghubir Yadav Interview on Om Ka Hari: रघुबीर यादव फिल्म 'ओम का हरि' में पिता-बेटे के रिश्ते को पर्दे पर उतार रहे हैं। इस बीच उन्होंने अमर उजाला से खास बातचीत में अपने पिता के साथ अपने रिश्ते के बारे में बात की है। उन्होंने यह भी बताया है कि वह अपने बेटे के साथ कैसा रिश्ता रखते हैं।
 
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रघुबीर यादव - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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अभिनेता रघुबीर यादव फिल्म 'ओम का हरि' में पिता-बेटे के रिश्ते और उनकी अलग सोच के टकराव को पर्दे पर उतार रहे हैं। अभिनेता  के लिए यह रिश्ता सिर्फ फिल्म की कहानी नहीं था। किरदार करते हुए उन्हें बार-बार अपने पिता की याद आई। हाल ही में अमर उजाला से बातचीत में रघुबीर यादव ने पिता के साथ अपने रिश्ते को याद किया। उन्होंने बचपन में मिली डांट-मार से लेकर घर छोड़ने, पिता के खत और करीब 20 साल बाद NSD की डिग्री लेकर लौटने तक की पूरी कहानी सुनाई।
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पिता ने क्यों मारा?
फिल्म में पिता का किरदार निभाते हुए रघुबीर यादव को अपना बचपन याद आ गया। किसान परिवार में पले-बढ़े रघुबीर ने बचपन में बैलगाड़ी चलाने से लेकर भैंस चराने और दूध बेचने जैसे काम तक किए। वह कहते हैं, 'जब घर छोड़कर चला आया था तो पिता ने मुझे बहुत मारा-पीटा। मैं किसान परिवार से हूं। बचपन में भैंस चराता था, बैलगाड़ी चलाता था, दूध बेचने का काम और बहुत सारी चीजें करते थे। उसी दौरान अगर परेशानी में उनके काम के आड़े आ जाता था तो मार-पीट देते थे।'

रघुवीर यादव - फोटो : इंस्टाग्राम@raghubir_y
बहन की वजह से पड़ती थी मार
बहन से जुड़ा बचपन का किस्सा सुनाते हुए रघुबीर हंसते हुए कहते हैं, 'मैं बहन से छोटा था और पिता उसकी ज्यादा कदर करते थे। बहन भी कई बार मुझे पिटवा देती थी। उसको मुझसे कोई काम करवाना होता और मैं नहीं करता तो पिता से मेरी शिकायत कर देती थी। फिर मुझे मार पड़ जाती थी। तो ऐसे ही बहुत सारी चीजों के बीच हम बड़े हुए हैं।'

पिता ने क्यूं कहा- अब मैं तुझे नहीं डांटूंगा?
घर छोड़ने के बाद पिता से हुई बातचीत को याद करते हुए रघुबीर कहते हैं, 'जब मैं घर छोड़कर आ गया तो मेरे पिता ने मुझे लिखा कि अब मैं तुझे कभी नहीं डांटूंगा, वापस आ जा। मैंने कहा कि मैं नहीं आऊंगा। मैं ऐसा कोई काम नहीं करूंगा, जिससे आपकी इज्जत खराब हो। इस पर उन्होंने कहा, ठीक है, जो तुझे करना है कर।'
 

रघुवीर यादव - फोटो : सोशल मीडिया
पिता की कैसी थी प्रतिक्रिया?
रघुबीर बताते हैं कि पिता ने आखिरकार उनके फैसले को स्वीकार कर लिया था। वह कहते हैं, 'जब मैंने ऐसी बात की तो उन्होंने उसे मान भी लिया। करीब 20 साल बाद जब मैं NSD (नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा ) की डिग्री लेकर उनके सामने पहुंचा तो मैंने उनका चेहरा देखा। ऐसा लगा कि शायद उन्हें बहुत अफसोस था या पता नहीं क्या था। लेकिन मुझे उस वक्त गर्व महसूस हुआ। क्योंकि जिस तरह से उन्होंने मेरे साथ बर्ताव किया था, वह मेरी भलाई के लिए था। उसी की वजह से तो मैं आज यहां पहुंचा हूं।'

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जो होता है अच्छे के लिए होता है
रघुबीर आज अपने पिता की उस सख्ती को अलग नजर से देखते हैं। वह कहते हैं, 'अगर बड़े लाड़-प्यार से मुझे रख लेते और वहीं नौकरी करवा देते, वहीं फैक्ट्री में लगा देते तो मेरा जीवन वहीं खत्म हो गया होता। इसलिए मैं हमेशा मानता हूं कि जो भी होता है, बेहतर के लिए होता है। मैंने हमेशा हर चीज को सकारात्मक तरीके से लिया है।' 
 

रघुवीर यादव - फोटो : सोशल मीडिया
असल जिंदगी से कैसे मेल खाती है फिल्म?
यही सोच उन्हें फिल्म  में भी अपने किरदार के करीब लगती है। रघुबीर कहते हैं, 'फिल्म में भी कुछ ऐसा ही है। पिता अपनी जगह सही है और बेटा अपनी जगह। पिता ने जो परेशानी और दिक्कतें झेली हैं, वो नहीं चाहता कि उसका बेटा भी वो सब झेले। वह चाहता है कि बेटा अपने पैरों पर खड़ा हो और अपनी जिंदगी सही तरीके से जिए। बस, उसी नीयत से वह अपने बेटे को बड़ा कर रहा है।' वहीं, बेटे की अपनी सोच भी उन्हें समझ आती है। वह कहते हैं, 'बेटा अपनी दुनिया अपनी तरह जीना चाहता है। वह अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीना चाहता है। हमें अपनी जिंदगी जीने दो, यही उसकी सोच है। यही चीज मुझे इस किरदार में बड़ी मजेदार लगी। मुझे इसे करने में बहुत मजा आया।'
 

कौन सा बदलाव करेंगे रघुवीर?
अपने पिता की कौन सी बात वह खुद में नहीं रखना चाहते, इस पर रघुबीर कहते हैं, 'सबसे पहले तो यही कि पिता हमारी बात नहीं सुनते थे। मैं चाहता हूं कि मैं अपने बेटे की हमेशा सुनूं। उसकी बात सुनूं और समझूं कि उसके लिए क्या बेहतर है।' पिता की एक और आदत का जिक्र करते हुए वह कहते हैं, 'वो दूसरों की बातों में बहुत जल्दी आ जाते थे। लेकिन मैं दूसरों की बातों में नहीं आता। मैंने यह तय किया है। 
 

रघुवीर यादव - फोटो : सोशल मीडिया
अब जमाना बदल गया है
समय के साथ पिता और बच्चों के रिश्ते में आए बदलाव पर रघुबीर कहते हैं, 'जमाने के हिसाब से बहुत सारी चीजें और सोच बदलती चली जाती है। पहले के पिता कुछ और हुआ करते थे। मैंने ऐसे पिता देखे हैं, जिनकी कही हुई बात पत्थर की लकीर होती थी। उन्होंने जो कह दिया, वही आखिरी बात होती थी। धीरे-धीरे जमाना बदला। पिता भी बच्चों को समझने लगे कि उनकी बात में भी कुछ सही हो सकता है। लेकिन अब सिर्फ थोड़ा-बहुत समझना काफी नहीं है। बच्चों को पूरी तरह समझना पड़ेगा।'
 

बेटे के साथ कैसा है रघुबीर का रिश्ता?
अपने बेटे के साथ रिश्ते पर रघुबीर कहते हैं, 'मेरा बेटा Gen Z है। लेकिन एक बात बता दूं, मैं सच कह रहा हूं, हमारे बीच कोई लाग-लपेट नहीं है। जो सही है, वो सही है और जो गलत है, वो गलत है।' वह बताते हैं कि उनका बेटा अपनी बात सीधे कह देता है। रघुबीर कहते हैं, 'इस जमाने में तो वो कभी-कभी मुझे सुना भी देता है। लेकिन मैं अपने बच्चों के साथ ऐसा नहीं कर सकता। मैं तो वैसे ही बहुत जल्दी भावुक हो जाता हूं।' अपनी इसी भावुकता का उदाहरण देते हुए वह कहते हैं, 'मैं तो अपने छोटे भाई को भी कभी डांट देता हूं तो बाद में मुझे बुरा लगने लगता है। उसका फोन आ जाए तो मुझे याद आ जाता है कि मैंने उसे तकलीफ दी थी। मुझे खुद तकलीफ होने लगती है।'
 

रघुवीर यादव - फोटो : सोशल मीडिया
पर्दे से अलग कैसा है बाप-बेटे का रिश्ता?
पिता और बेटे के बीच की दूरी को रघुबीर ने सिर्फ पर्दे पर नहीं, असल जिंदगी में भी करीब से देखा है। वह कहते हैं, 'मैंने इस तरह के रिश्ते बहुत देखे हुए हैं। ये तो कुछ भी नहीं है। इससे भी ज्यादा उठापटक वाले रिश्ते देखे हैं, जहां एक-दूसरे का मुंह तक नहीं देखते। लोग जिस माहौल में पले-बढ़े हैं, जिस तरह की जिंदगी उन्होंने जी है, उसी हिसाब से अपने बच्चों के बारे में सोचते हैं। फिर बच्चे अपने पिता के बारे में जिस तरह सोचते हैं, वो भी अलग होता है। मैंने ऐसी बहुत सारी जिंदगियां बनते और बिगड़ते देखी हैं।'
 
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रघुबीर को क्या पसंद है?
वह आगे कहते हैं, 'मैं किसान परिवार से रहा हूं। गांव और कस्बों में काफी रहा हूं। यूपी, एमपी, बिहार, राजस्थान में भी रहा हूं। क्योंकि मैं एक्टर हूं, तो मेरे पेशे की सबसे पहली जिम्मेदारी ही लोगों को देखना और समझना है। मुझे लोगों को देखना और समझना बहुत अच्छा लगता है। ऐसे लोगों के साथ खूब रहा हूं। दोस्तियां भी रही हैं, दुश्मनियां भी। तो लोगों के साथ रहा, करता रहा और सीखता रहा।'
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