एक्टर को हर चीज का एक्सपर्ट होना जरूरी नहीं
'मैथेमेटिक्स में मैं बहुत बुरा रहा हूं। इकोनॉमिक्स में नंबरों का खेल, उसके कॉन्सेप्ट्स समझना आसान नहीं होता। लेकिन जैसे-जैसे आप बड़े होते हैं, आपको दुनिया को समझना पड़ता है। जीएसटी, जीडीपी जैसी चीजें हमने भी लोगों से समझीं, अखबार पढ़कर समझीं। मेरा मानना है कि एक एक्टर को हर चीज का एक्सपर्ट होना जरूरी नहीं है, लेकिन हर चीज की जानकारी होनी चाहिए। जब आप कोई रोल करते हैं तो उसका अपना प्रोफेशन, अपनी दुनिया होती है। उदाहरण... अगर आप किसी वकील का रोल कर रहे हैं तो आपको ये पता होना चाहिए कि कोई केस हाई कोर्ट में क्यों जाता है और सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचता है। 'गवर्नर' करते हुए मुझे आरबीआई के कामकाज और अर्थव्यवस्था की कई बातें समझने का मौका मिला।'
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आज के बच्चों को यकीन भी न हो
‘इस फिल्म में हम जिस समय की बात कर रहे हैं, उस समय बहुत सी चीजें शुरू भी नहीं हुई थीं। उसके बाद बाजार खुला, दुनिया के देश एक-दूसरे से जुड़े, व्यापार बढ़ा और बहुत कुछ बदल गया। आज के किसी बच्चे को आप उस समय की कहानी सुनाएंगे तो शायद उसे यकीन भी न हो। लेकिन ये जानना जरूरी है कि कोई भी बदलाव अचानक नहीं आता। उसके पीछे बहुत सारे लोगों की मेहनत, त्याग, सोच, दिमाग और जुनून होता है। इसलिए मुझे लगता है कि ये फिल्म बहुत जरूरी है।’
आईएएस, आईपीएस और जजों तक के मैसेज आ रहे हैं
'जब गवर्नर का ट्रेलर रिलीज हुआ, तो मुझे कई सारे मेसेजेस आए। वो सिर्फ आम ऑडियंस से नहीं हैं। मेरे बहुत सारे आईएएस, आईपीएस दोस्त हैं, जज हैं और पॉलिटिशियन हैं। उन सबके भी मैसेज आ रहे हैं कि 'ये तो देखा जाएगा'। मेरे ख्याल से फिल्म को लेकर लोगों के मन में एक उत्सुकता जरूर पैदा हुई है और यही सबसे बड़ी बात है।'
ये फिल्म आज के हालात देखकर नहीं लिखी गई
'ये फिल्म मुझे साढ़े चार साल पहले ऑफर हुई थी। यानी की इसकी कहानी और लेखन का काम तो उससे भी पहले शुरू हो चुका था। इसलिए इसका आज के हालात से कोई सीधा संबंध नहीं है। हां, इतना जरूर है कि इकोनॉमिक क्राइसिस का जो मसला है, उससे लोग जुड़ पाएंगे। परिस्थितियां दोनों समय की अलग हैं, लेकिन आर्थिक संकट का विषय ऐसा है जिससे लोग आसानी से रिलेट कर सकते हैं।'
इंडस्ट्री का गवर्नर बना तो यह काम करूंगा
‘अगर मैं कभी इंडस्ट्री का गवर्नर बना तो सबसे पहले मैं बॉक्स ऑफिस कल्चर को बंद करवा दूंगा। इन आंकड़ों का प्रचार-प्रसार बंद करवा दूंगा। आम ऑडियंस का इससे कोई लेना-देना नहीं है। किसी फिल्म ने 500 करोड़ कमाए तो भी ऑडियंस की जिंदगी नहीं बदलती। मौका मिले तो मैं इसी कल्चर को बदलने की कोशिश करूंगा।’
घर पर बैठा रहा, खूब बेरोजगारी देखी
‘फिल्म में मेरा किरदार देश को एक बड़े आर्थिक संकट से बाहर निकालने की कोशिश करता है। रियल लाइफ में भी मैंने ऐसे कई दौर देखे हैं। लेकिन मैं थोड़ा मोटी चमड़ी का आदमी रहा हूं, क्योंकि जो मन करता है वही करता रहा हूं। 1993 में मुंबई आया था। उस समय जिस तरह की फिल्में बन रही थीं, उसमें अपने मन का काम कर पाना बहुत मुश्किल था। फिर भी जब मौका मिला तो मैंने 'सत्या', 'शूल', 'जुबैदा', 'दिल पे मत ले यार', 'पिंजर' और 'रोड' जैसी फिल्में कीं।
उस समय ऐसी फिल्में ज्यादा बनती नहीं थीं इसलिए लंबे समय तक घर पर बैठा रहा। बेरोजगारी भी देखी। इतनी ऊंचाई हासिल करने के बाद गिरा भी, लेकिन मैं कभी घबराया नहीं।’