मशहूर गीतकार योगेश कभी नहीं चाहते थे कि उन पर किसी की जान-पहचान का फायदा उठाने का आरोप न लगे, इसलिए उन्होंने अपने उपनाम ‘गौड़’ से छुटकारा पाने का फैसला किया था। हार्पर कॉलिंस इंडिया द्वारा प्रकाशित और अनुभवी पत्रकार राजीव विजयकर द्वारा हिंदी फिल्म गीतकारों पर लिखित ‘मैं शायर तो नहीं’ पुस्तक में यह दावा करते हुए लिखा है कि अपने दम पर फिल्म उद्योग में अपनी पहचान बनाने के प्रयास में योगेश ने अपना उपनाम हटाया था।
गीतकार योगेश अपने पिता की मौत के बाद काम की तलाश में 1950 के दशक में लखनऊ से मुंबई आए थे। योगेश के फुफेरे भाई और उस समय के लोकप्रिय पटकथा लेखक बृजेन्द्र गौड़ सपनों के शहर मुंबई में ही रहते थे। लेकिन योगेश नहीं चाहते थे कि उनके भाई कभी भी उन पर काम के लिए उनकी जान पहचान का फायदा उठाने का आरोप लगाए।
पुस्तक में लिखा है कि एक चॉल में अकेले रहने के दौरान ही उन्होंने अपने उपनाम से छुटकारा पा लिया था। बेरोजगारी के दौरान उन्हें अपने फुफेरे भाई बृजेन्द्र गौड़ से कोई मदद नहीं मिली थी, लेकिन उन्हें एक करीबी दोस्त का सहयोग मिला था। मशहूर गीतकार 77 वर्षीय योगेश गौड़ का शुक्रवार को निधन हो गया था।
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