लतिका नाथ के द्वारा खींची गई तस्वीर
- फोटो : सौजन्य लतिका नाथ
और, देश में कभी ऐसा कुछ ऐसा हुआ जो आज भी न भूलता हो?
एक जीव विज्ञानी और एक संरक्षक फोटोग्राफर के तौर पर काम करते हुए मुझ पर हमला किए जाने की घटना कई बार हुई है। एक समय जब मैं अपनी पीएचडी के लिए शोध कर रही थी और मुझे बांधवगढ़ नेशनल पार्क (राष्ट्रीय अभयारण्य) में पैदल जाने की अनुमति दी गई थी, मैं बाघों की पहचान और निगरानी के लिए कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल कर रही थी। क्योंकि मुझे पार्क से जुड़ी अंदरुनी जानकारी थी। मैं पानी के गढ्ढों या पगडंडियों पर कैमरा ट्रैप लगाती थी जहां मुझे बाघों के बार बार आने के बारे में पता था। हमने सुना था कि जंगल में एक नई बाघिन है।
उस दिन आप वहां क्या करने गईं थीं?
मैं किसी भी तरह उस बाघिन की तस्वीर हासिल करना चाहती थी। हम नदी के ताल में स्थित एक पानी के गढ्ढे की तरफ गए जहां मुझे उम्मीद थी कि वह आएगी। जब हम कैमरा ट्रैप लगाने का काम पूरा कर रहे थे, करीब करीब अंधेरा हो गया था और हमें अचानक खतरे की घंटी सुनाई देने लगी। हमें महसूस हुआ कि एक बाघ आ रहा था। मेरे सहायक और मैंने जल्दी से अपना काम पूरा किया और नाले से दूर जहांहमारी गाड़ी खड़ी की गई थी उस दिशा में सडक की ओर तेजी से बढ़ने लगे। जैसे ही हम नाले से बाहर आए और चलना शुरू किया, रास्ते के बाजू से बाघ सामने आ गया।
फिर क्या हुआ?
मुझे नहीं पता कौन ज्यादा चौंका या डर गया, मैं या वो बाघ। सौभाग्य से उसके जबड़े में एक हिरण था जिसका उसने अभी शिकार किया था। बाघ मुझसे तीन फीट से भी कम दूरी पर था। उसने मुंह में हिरण पकड़े पकड़े मेरी तरफ गोल आंखों से घूरकर देखा। मैं वहीं पर जम गई थी। और फिर मैंने धीरे धीरे छोटे कदमों से पीछे की ओर चलना शुरू किया। मेरे सहायकों ने भी वही किया। हम पीछे की ओर दूर चले गए तब तक बाघ भी पीछे नहीं मुड़ा। हमने घूमकर दूसरा रास्ता पकड़ा और हमारी कार तक पहुंचे। बाद में उसी दिन शाम को पानी के गढ्ढे के पास हम शावक के साथ नई बाघिन की तस्वीर ले पाने में सफल रहे।
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