विक्रम पोतदार द्वारा ली गई तस्वीर
- फोटो : सौजन्य विक्रम पोतदार
उस पल की याद आती है तो क्या ख्याल आते हैं?
जैसे ही मुझे परफेक्ट तस्वीर मिल गई, भालू आगे की ओर चला गया और इंद्रधनुष भी गायब हो गया। तो, इंद्रधनुष बनते हुए देखने से लेकर, लेन्स बदलना, प्लेटफॉर्म पर जाना, एक परफेक्ट तस्वीर क्लिक करना और इंद्रधनुष का गायब हो जाना, यह सबकुछ केवल दो मिनट में हो गया। लेकिन इन दो मिनटों में मैं वह परफेक्ट तस्वीर ले सका जिसे मैंने दिमाग में तैयार किया था। मेरे साथ करीब 15 फोटोग्राफर्स थे, किसी ने भी इस प्राकृतिक आवास की तस्वीर के बारे में नहीं सोचा। और मैं खुश हूँ कि जीवन में एक बार आने वाले उस क्षण की तस्वीर मैं ले सका।
कभी ऐसा अनुभव आया क्या आपकी जान किसी एक फोटो के लिए खतरे में पड़ी हो?
मैंने शायद ही कभी ऐसी स्थिति का सामना किया होगा जहां मुझ पर हमला हुआ हो या फिर मुझे जानवरों से खतरा महसूस हुआ हो। आमतौर पर जानवर काफी शांत होते हैं और वे आपके रास्ते में नहीं आते। लेकिन यदि आपने एक सुरक्षित दूरी और उनकी निजता पर अतिक्रमण किया है और आपकी मौजूदगी से उन्हें खतरा महसूस होता है तो वे आप पर हमला करते हैं।
और, किसी जंगली जानवरी के सबसे करीब आप कभी पहुंचे तो कितना पहुंचे?
पिछले 13-14 सालों में मुझे एक या दो बार ऐसी परिस्थिति का सामना करना पड़ा। श्रीनगर से 10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित दाचीगाम नेशनल पार्क की एक घटना है। 2014 में ऐसी ही एक ट्रिप के दौरान ऐसी ही एक घटना से मेरा सामना हुआ जहां सुबह करीब 5.30 बजे हम पार्क में गए। वहां एक संकरा रास्ता था और सितंबर के आखरी सप्ताह के दौरान ओक (शाहबलूत) वृक्ष के फलों के पकने का मौसम था और भालू इन फलों को खाने आते हैं। उस दिन हम संकरे रास्ते से जा रहे थे और अचानक कहीं से बिना किसी संकेत के मुझसे केवल चार फीट की दूरी पर एक भालू आया और उसने ज़ोर से गर्जना की। मुझे आज भी वह गर्जना याद है, वो काफी डरावनी थी।
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