भारतीय सिनेमा के इतिहास में कई ऐसी फिल्में बनी जो पूरी तरह से महिला प्रधान रहीं। इन फिल्मों में महिलाओं के अलग रंग-रुप देखने को मिले। महिलाओं की ये कहानियां थीं ही इतनी शानदार कि कोई भी इनको नकार नहीं सका। कुछ फिल्में तो ऐसी रहीं जो माइल स्टोन साबित हुईं।
मदर इंडिया
महिला प्रधान फिल्मों की फेहरिस्त में मदर इंडिया का दर्जा सबसे ऊपर है। 1957 में आई इस फिल्म को आज भी लोग नहीं भूले हैं। फिल्म में एक महिला की जिंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव और जबर्दस्त संघर्ष की कहानी को पूरी संवदेना से पिरोया गया।
नरगिस की निभाई ये भूमिका यादगार बन गई। फिल्म की हीरोइन अपने पति की मौत के बाद न सिर्फ मेहनत मजदूरी करके अपने छोटे-छोटे बच्चों का भरण पोषण करती है बल्कि बड़े होने पर बिगड़ चुके अपने बेटे को महिला के साथ बदसलूकी की सजा उसे अपने हाथ से मौत के घाट उतारकर देती है।
दामिनी
1993 में आई फिल्म दामिनी को कोई नहीं भूल सकता। इस फिल्म ने मीनाक्षी शेषाद्री के कैरियर को एक नए मोड़ पर पंहुचाया। ये एक ऐसी सत्यवादी महिला की फिल्म थी जो सच का साथ देते हुए अपने ही परिवार के लोगों के खिलाफ खड़ी हो जाती है।
वह एक बलात्कार पीड़ित नौकरानी को न्याय दिलाने में अपने देवर और उसके दोस्तों के खिलाफ जंग लड़ती है। हालांकि अपने असूलों की पक्की इस महिला के खिलाफ उसका परिवार बागी भी हो जाता है लेकिन अंत में जीत उसके सत्य की ही होती है।
अर्थ
अर्थ 1982 में रिलीज हुई थी जिसमें शबानी आजमी ने एक ऐसी गृहणी का रोल अदा किया जिसका पति दूसरी औरत के चक्कर में पड़ जाता है।
फिल्म की हीरोइन अंत में तमाम संर्घषों का सामना करते हुए अपने पति को सुधारती है और अपनी शादीशुदा जिंदगी को पटरी पर लाती है। एक हाउस वाइफ और घरेलू हिंसा का चित्रण फिल्म में महिला की संवेदना को बयां करता था जिसमें शबानी आजमी ने जान डाल दी।
नो वन किल्ड जेसिका
नो वन किल्ड जेसिका वर्ष 2011 में रिलीज हुई थी जो जेसिका मर्डर केस पर आधारित थी। फिल्म पूरी तरह से महिला प्रधान थी जिसमें रानी मुखर्जी और विद्या बालन मुख्य भूमिका में थीं।
रानी मुखर्जी फिल्म में मीरा गेटी नाम की पत्रकार बनी थीं जो बेहद ही बिंदास भूमिका थी। रानी ने फिल्म में बेहद आधुनिक लेकिन संवेदनशील पत्रकार की भूमिका में जान डाल दी।
एक ओर जहां उन्होंने जमकर गालियां बरसाई, धुंए के छल्ले उड़ाए तो वहीं दूसरी ओर इंसाफ की जंग में एक बहन को उसकी बहन के हत्यारों के खिलाफ लड़ाई में फतह दिलवाई।
खून भरी मांग
1988 में आई ये फिल्म ऐसी महिला की कहानी थी जिसे उसका पति दूसरी औरत के चक्कर में मगरमच्छ के मुंह में फेंक देता है और मरा हुआ मान लेता है। लेकिन महिला जिंदा बच जाती है और एक बदले रंग-रुप का सहारा लेकर अपने पति से चुनचुन कर बदला लेती है।
मृत्युदंड
इस फिल्म में माधुरी दीक्षित और शबाना आजमी मुख्य भूमिका में थीं। ग्रामीण परिवेश पर आधारित इस फिल्म में सामाजिक कुप्रथाओं के खिलाफ महिला द्वारा आवाज बुंलंद की गई थी। माधुरी ने यादगार एक्टिंग की थी।
गुलाब गैंग
गुलाब गैंग फिल्म आजकल खासी चर्चाओं में है। ये एक ऐसी फिल्म है जिसमें महिलाओं के दो अलग रुप हैं। एक अच्छी महिला का संघर्ष इस बार बुरी महिला से है। फिल्म में माधुरी दीक्षित पॉजीटिव किरदार में हैं तो अपने फिल्मी कैरियर में पहली बार जूही चावला नकारात्मक भूमिका प्ले कर रही हैं।