मशहूर नाटककार शेक्सपियर के विख्यात नाटक 'हैमलेट' पर आधारित विशाल भारद्वाज की फ़िल्म 'हैदर' की मीडिया में काफ़ी चर्चा हो रही है।
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1990 के दशक के कश्मीर की पृष्ठभूमि पर बनी इसी फ़िल्म को कुछ लोग विशुद्ध सिनेमा का नमूना मान रहे हैं, तो कुछ लोगों को लग रहा है कि इसमें भारतीय सेना को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं किया गया है।
ट्विटर पर भी इस फ़िल्म को लेकर दो खेमे बन गए हैं और महज चंद दिनों में फ़िल्म के पक्ष-विपक्ष में हजा़रों ट्वीट किए जा चुके हैं।
वहीं विशाल भारद्वाज ने कहा है कि वो अपने देश के ख़िलाफ़ कोई फ़िल्म नहीं बना सकते लेकिन जो चीज़ मानवता विरोधी होगी उसपर वो ज़रूर टिप्पणी करेंगे।
मसला है विवादित
बॉलीवुड निर्देशक विशाल भारद्वाज के विलियम शेक्सपियर के मशहूर नाटक 'हैमलेट' के फ़िल्मी रूपांतरण 'हैदर' को 'इस साल की सबसे महत्वपूर्ण फ़िल्म' कहा जा रहा है।
विशाल अपने शेक्सपियर-प्रेम के लिए जाने जाते हैं। वो साल 2002 में शेक्सपियर के 'मैकबेथ' पर आधारित 'मक़बूल' और साल 2006 में उन्हीं के 'ओथेलो' पर आधारित 'ओमकारा' बना चुके हैं।
लेकिन उनकी इस तीसरी फ़िल्म को मीडिया में कुछ ज़्यादा चर्चा मिल रही है क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि एक विवादित मुद्दे पर आधारित है। इस फ़िल्म में भारत प्रशासित कश्मीर की कहानी कही गई है।
विशाल की फ़िल्म में शाहिद कपूर(हैमलेट), श्रद्धा कपूर (ओफेलिया), तब्बू (जर्ट्रुड) और केके मेनन(क्लाडियस) मुख्य भूमिकाओं में हैं। फ़िल्म में नाटक के विख्यात उतार-चढ़ावों को 1990 के दशक के कश्मीर की पृष्ठभूमि में पूरी सफलता के साथ रूपांतरित किया गया है।
लापता लोगों की कहानी
हैदर कवि है। जब वह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से पढ़ाई करके कश्मीर में अपने घर लौटता है तो घाटी में चरमपंथ अपने उरूज पर है। घर वापस आने पर उसे पता चलता है कि उसके पिता लापता हैं और उसकी माँ उसके चाचा के साथ रहने लगीं हैं।
फ़िल्म की कहानी शाहिद के चरित्र के इर्द-गिर्द घूमती है जो निकला तो अपने पिता को खोजने के ख़तरनाक अभियान पर। लेकिन उसकी यह खोज राज्य के जटिल राजनीति में उलझ जाती है।
फ़िल्म आलोचकों का मानना है कि भारद्वाज कश्मीर पर पकड़ बनाए रखते हुए वो 'हैमलेट' की मूल भावना को पर्दे पर उतारने में सफल रहे हैं।
कश्मीर 1990 के दशक में हथियारबंद अलगाववादी समूहों और भारतीय सुरक्षा बलों के बीच होने वाले हिंसक संघर्षों का गवाह बना। ये अलगाववादी समूह "भारतीय शासन" से मुक्ति की मांग कर रहे थे।
असल मामला क्या है?
भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर पर दावेदारी जताते रहे हैं। दोनों के बीच पिछले 60 सालों से यह एक विवादित मुद्दा रहा है। दक्षिण एशिया के इन दो पड़ोसी देशों के बीच कश्मीर को लेकर दो युद्ध और कई छिटपुट संघर्ष हो चुके हैं।
भारत अक्सर पाकिस्तान पर उसके अंदरूनी मामले में दखल देने और हथियारबंद समूहों को समर्थन देने का आरोप लगाता रहा है। हालांकि भारद्वाज की फ़िल्म दोनों देशों के बीच की दुश्मनी से लगभग दूर ही रहती है। यह फ़िल्म राज्य में हुए मानवाधिकार के हनन के मामलों पर केंद्रित है।
मानवाधिकार कार्यकर्ता अक्सर सुरक्षाबलों पर ग़ैर-क़ानूनी बंदी शिविरों में स्थानीय युवकों के अपहरण और प्रताड़ना का आरोप लगाते रहे हैं। हालांकि भारतीय सेना ने हमेशा इस आरोप से इनकार किया है।
क्या ये विशाल का साहस है?
द गार्डियन में जैसन बर्क ने लिखा है कि 'हैदर' में भारतीय सेना के कैंपों में प्रताड़ित करने और भारतीय अधिकारियों द्वारा मानवाधिकारों के हनन के दूसरे तरह के मामलों को दिखाया गया है। भारद्वाज के साहसिक चित्रण को आलोचकों एवं उनके प्रशंसकों ने काफ़ी पसंद किया है।
ज़्यादातर विश्लेषकों का मानना है कि कश्मीर पर ज़्यादातर फ़िल्में वहाँ के असल मुद्दों को दिखाने में विफल रही हैं। हैदर ने इस खालीपन को भरा है। द हिन्दू के अनुसार, "दो जंगली घोड़ों की एक साथ सवारी करने के लिए साहस, महत्वाकांक्षा और कुशलता चाहिए।"
अखबार लिखता है, "भारद्वाज ने हैमलेट के रूपांतरण के साथ ही शेक्सपीयर पर आधारित अपनी त्रयी की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म बनाई है।।।यह फ़िल्म कश्मीर के हालिया इतिहास पर एक साहसिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। अख़बार के अनुसार, "फ़िल्म में इससे कोई इनकार नहीं है कि लापता लोगों की सामूहिक कब्रें मिली हैं।"
फर्स्टपोस्ट वेबसाइट ने लिखा है, "कश्मीर की असुविधाजनक राजनीति को दिखाने" एक बड़ी चुनौती है और वो भी तब "जब यह मुद्दा कश्मीर की जनता और भारत के बीच तनाव के केंद्र में रहा है।"
वहीं कुछ लोग भारद्वाज की यह कहकर आलोचना भी कर रहे हैं कि उन्होंने भारतीय सेना को "अनुचित" तरीके से दिखाया है। लेकिन भारद्वाज ने फ़िल्म की कहानी का बचाव किया है।
विशाल ने कहा, "मैं भी भारतीय हूँ। मैं देशभक्त भी हूँ। मैं अपने देश को प्यार करता हूँ। इसलिए मैं ऐसा कोई काम नहीं करना चाहता जो राष्ट्रविरोधी हो। लेकिन जो चीज़ मानवविरोधी हो, मैं उसपर राय ज़रूर दूँगा। "