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झूठों को कौओं से कटाने वाला राजनेता नहीं रहा

Mon, 09 Sep 2013 10:23 AM IST
जयप्रकाश पाराशर/अमर उजाला, भोपाल
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फिल्मों में उनसे बेहतर गीत लिखने वाले हो सकते हैं, मंचों पर उनसे बेहतर कविता पढ़ने वाले हो सकते हैं, लेकिन उनसे ज्यादा सच्चा, सरल-सहज नेता शायद नहीं होगा।
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फूलछाप बीड़ी वाले गुजराती पटेल के घर पैदा हुआ यह इंसान कई मायनों में असाराधारण था। सत्तर के दशक में हिंदी फिल्मों के गीत लिखने वाले विट्ठलभाई पटेल मध्य प्रदेश में मंत्री रहे।

वह ऐसे राजनीतिक नेता थे, जो कभी झूठ नहीं बोलते थे, समय के पाबंद थे, खंडवा में किशोर कुमार का स्मारक बनाने के लिए एक-एक रुपए की भीख मांग सकते थे और नगर निगम की उपेक्षा के खिलाफ खुद झाड़ू लेकर सफाई पर निकल सकते थे।
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वह गांधी तो नहीं थे लेकिन ऐसे गांधीवादी थे, जिनके पीछे लोग निकल पड़ते थे। विट्ठलभाई पटेल का शनिवार को सागर में 79 वर्ष की उम्र में स्वर्गवास हो गया।

सागर के पत्रकार पंकज सोनी कहते हैं, 'करीब दो साल से उनका स्वास्थ्य खराब चल रहा था और वे सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई नहीं दे रहे थे। अन्यथा वे सामाजिक सरोकार के हर कार्यक्रम में लाठी टेकते हुए हाजिर हो जाते, अपनी राय व्यक्त करके ही लौटते थे।'

'झूठ बोले कौआ काटे'
फिल्मों में मुश्किल से 40 से ज्यादा गीत लिखे होंगे। जब राजकपूर ने अपने बेटे ऋषिकपूर और डिंपल कपाड़िया को लेकर 'बॉबी' फिल्म बनाई तो हर घर के रेडियो पर पर एक गीत बज रहा थाः 'झूठ बोले कौआ काटे, काले कौए से डरियो, मैं मइके चली जाऊंगा तुम देखते रहियो।'

विट्ठलभाई के करीबी सहयोगी महेश तिवारी बताते हैं, 'एक कहावत से उठाए मुखड़े पर रचे गए गीत झूठ बोले कौआ काटे ने विट्ठलभाई को स्टार बना दिया था। अहम बात यह थी कि राजनीति में रहे विट्ठलभाई का झूठ बोलने में जरा भी यकीन नहीं था। वह सत्य के हिमायती थे और उनका सत्य बेबाक व ठेठ होता था। वह बहुत सरल सहज इंसान थे। वह ऐसे नेता थे जिनका हर कोई आदर करता था।'

यही कारण था कि विश्वनाथ प्रताप सिंह ने जब राजीव गांधी के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया तो विट्ठलभाई ने उन्हें ईमानदारी के लिए बधाई दे डाली। उस समय वह खुद आज कांग्रेस के कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा के मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री थे।

वोराजी उन्हें चाहते थे और उन्होंने कहा कि विट्ठलभाई ने यह बधाई एक कवि के रूप में दी है। किसी तरह विट्ठलभाई पटेल का मंत्रीपद भले ही वोरा जी ने बचाया हो, लेकिन विट्ठलभाई ने कहा कि उनके लिए साहित्यकार होना ज्यादा अहम है।

मनोज कुमार और हेमामालिनी की फिल्म संन्यासी का चर्चित गाना 'बाली उमरिया भजन करूं कैसे, चढ़ती जवानी जोगन बनूं कैसे' भी विट्ठलभाई का लिखा था।

विट्ठलभाई का अद्भुत किस्सा खंडवा के जय नागड़ा सुनाते हैं। 'विट्ठलभाई को यह बात सालती थी कि खंडवा में किशोर कुमार का कोई स्मारक नहीं बनाया जा रहा है। एक बार उन्होंने अभियान छेड़ दिया, एक-एक रुपए इकट्ठे करने का। खंडवा से लेकर सागर तक एक-एक रुपया मांगने लगे। नतीजा यह हुआ कि सरकार को किशोर कुमार का स्मारक बनाना पड़ा।'
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