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यहां से निकला था 'सात हिंदुस्तानी' का वह एक्टर

Mon, 09 Sep 2013 08:01 AM IST
रामकृष्ण
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सदी के महानायक अमिताभ उन दिनों अपने पिता हरिवंश राय बच्चन के बेटे के रूप में जाने जाते थे। कोलकाता स्थित बर्ड कंपनी में वह एक मामूली बाबू के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में काम पाने की कोशिश की थी, लेकिन वहां उन्हें सामान्य अनाउन्सर तक की जगह नहीं मिल पाई।
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तभी उनके अनुज अजिताभ ने उनको सुझाव दिया कि वह फिल्मी दुनिया में पहुंच बनाने का प्रयत्न क्यों न करें। लेकिन सवाल यह था कि वह आखिर किसके माध्यम से वहां प्रवेश करें। इंदिरा गांधी के साथ अमिताभ की मां तेजी का घरोपा था।

उनसे तेजी ने जब यह बात की तो वह तत्काल ख्वाजा अहमद अब्बास के नाम चिट्ठी लिखने के लिए राजी हो गईं। अब्बास उन दिनों `सात हिंदुस्तानी’ बनाने की तैयारी कर रहे थे। इंदिरा का संस्तुतिपत्र जब उन्हें मिला, तो वह अपनी फिल्म में एक छोटी सी भूमिका उन्हें देने के लिए तैयार हो गए।  
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मुंबई पहुंचने के बाद अमिताभ अंधेरी स्थित अपने एक मित्र के साथ ठहरे थे। जिस दिन फिल्म की यूनिट को गोवा की ओर प्रस्थान करना था उस दिन संयोगवश मैं अब्बास साहब के घर पर था। गोवा जाने के लिए अब्बास साहब ने एक बड़ी बस का इंतजाम किया था।

काफी इंतजार के बाद भी अमिताभ जब नहीं दिखे, तो अब्बास ने गुस्सा होना शुरू कर दिया। तभी अमिताभ हांफते-हांफते वहां पहुंचे। उनके एक हाथ में टिन का बक्सा था और दूसरे में मामूली होल्डाल।

उन दिनों वह बगैर लोटा-डोर कोई यात्रा नहीं करते थे। रास्ते में कहीं प्यास लग जाए तो कुएं से पानी आखिर वह कैसे निकालेंगे? इसी से हंसते-हंसते जलाल आगा ने उनसे सवाल किया था, `अपने लोटा-डोर को कहां भूल आए, जानेमन?’ हांफते-हांफते ही जलाल को आश्वस्त किया था अमिताभ ने, `वह दोनों चीजें मेरे बकस में रखी हैं।’
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