विशाल भारद्वाज और बशीर बद्र
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बशीर बद्र को पिता की तरह मानता हूं
विशाल भारद्वाज ने स्वतंत्र रूप से बशीर बद्र की कई गजलों का संगीत तैयार किया है और उन्हें रिलीज किया है। इनमें हाल ही में ‘मैं घना अंधेरा हूं’ शामिल है। उन्होंने कहा कि मेरे जीवन में कविता का सफर मेरे व्यक्तित्व, मेरी रचनात्मकता का सबसे मजबूत हिस्सा है।
मेरा संगीत मेरी कविता की वजह से है। मेरी फिल्में मेरी कविता की वजह से हैं। मेरे पिता भी कवि थे। मैं बशीर बद्र और गुलजार को अपने दूसरे माता-पिता के समान मानता हूं। उन्होंने मुझे संवारा है। मुझे बहुत खुशी है कि मेरे जीवन में उनका इतना प्रभाव रहा।
बशीर बद्र और विशाल भारद्वाज
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मेरठ से हुई थी बशीर बद्र और विशाल की दोस्ती की शुरुआत
अपनी दोस्ती को याद करते हुए विशाल ने बताया कि इसकी शुरुआत मेरठ में हुई, जहां बशीर बद्र रहते और पढ़ाते थे। उनकी बेटी और विशाल की बहन क्लासमेट थीं। सिंगर-संगीतकार ने कहा कि उस समय मेरी याददाश्त बहुत तेज थी, मैं आसानी से कविताएं याद कर लेता था। मैं हर वीकेंड डॉक्टर साहब से मिलने लगा। वे मुझे अपनी नई-नई कविताए पढ़कर सुनाते थे।
फिर एक बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी, 1987 में उनका घर जलकर राख हो गया। उनकी अधिकांश नई कविताएं घर के साथ ही जल गईं। हम लोग इतने बुरे हैं कि कवियों के घर जला देते हैं। इसी समय के आसपास उन्होंने ने अपनी पहली पत्नी को भी खो दिया था।
मुझे उनकी बताई हुई 90 प्रतिशत बातें याद थीं। वे मुझसे उन दोहों के बारे में पूछते थे और मैं उन्हें सुना देता था। मैंने उन्हें कम से कम 90 प्रतिशत कविताएँ याद करने में मदद की, इसमें एक साल लग गया।
बशीर बद्र ने ही मुझमें संगीतकार की प्रतिभा पहचानी
विशाल भारद्वाज को एक संगीतकार के रूप में प्रोत्साहित करने में बशीर बद्र की बड़ी भूमिका है। विशाल ने बताया कि उन्होंने ही सबसे पहले मुझमें छिपे संगीतकार को पहचाना था। मैं उन दिनों एक संगीतकार था और उन्होंने मुझमें उस प्रतिभा को पहचाना। मुझे साहित्य में कोई दिलचस्पी नहीं थी। मैं पढ़ाई में बहुत कमजोर था।
मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरा शेक्सपियर से कोई संबंध होगा। लेकिन गुलजार और बशीर बद्र की कोई भी किताब खोलिए, मैं पूरा पन्ना सुना सकता था। इन दोनों कवियों के बारे में मुझे इस तरह याद था।
जब मैं भोपाल में ‘मकबूल’ की शूटिंग कर रहा था, तो वो यहां आकर मेरे ही परिवार के साथ रहते थे। जब मैं मुंबई आया, तो वो मेरे घर आकर रुकते थे। गुलजार साहब और उनके साथ बिताए कई पल हमारे पास हैं। दोनों एक-दूसरे के काम के बड़े फैन थे।