फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Vinod Khanna: कभी अमिताभ से होती थी तुलना, स्टारडम छोड़कर विनोद खन्ना ने माली का किया काम, जानें दिलचस्प बातें

Sun, 27 Apr 2025 07:00 AM IST
मोहम्मद फायक अंसारी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

Vinod Khanna Death Anniversary: विनोद खन्ना अपने अभिनय से लाखों दिलों पर राज करते थे। अपने लुक और अदाकारी से उन्होंने लोगों के मन में खास जगह बनाई थी। आइए उनकी पुण्यतिथि पर उनके बारे में कुछ दिलचस्प बातें जानते हैं...
 
विज्ञापन
विनोद खन्ना - फोटो : एक्स @FilmHistoryPic
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

जिंदगी के रंगमंच पर कुछ सितारे ऐसे चमकते हैं, जो अपनी रोशनी से न केवल पर्दे को जगमगाते हैं, बल्कि दिलों को भी रोशन करते हैं। विनोद खन्ना ऐसी ही शख्सियतों में से एक थे। हिंदी सिनेमा में उनका नाम आज भी सम्मान से लिया जाता है। आइए उनकी पुण्यतिथि पर हम उनकी जिंदगी के उन अनछुए पहलुओं के बारे में बात करते हैं...

विज्ञापन

Kesari Veer: जारी हुआ 'केसरी वीर' का नया मोशन पोस्टर, योद्धा के रूप में नजर आए सूरज पंचोली

Trending Videos

बंटवारे के बाद मुंबई आया परिवार
विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर 1946 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में एक व्यापारिक परिवार में हुआ। उनके पिता कृष्णचंद खन्ना टेक्सटाइल और केमिकल के कारोबारी थे, जबकि मां कमला गृहणी थीं। साल 1947 के भारत-पाक विभाजन ने उनके परिवार को पेशावर छोड़कर मुंबई आने को मजबूर किया। मुंबई की गलियों में विनोद का बचपन बीता, जहां उन्होंने सेंट मैरी स्कूल में शुरुआती पढ़ाई की। साल 1957 में परिवार दिल्ली शिफ्ट हुआ, जहां उन्होंने दिल्ली पब्लिक स्कूल में दाखिला लिया। बाद में, 1960 में परिवार फिर मुंबई लौटा और विनोद को नासिक के बार्न्स बोर्डिंग स्कूल भेजा गया। विनोद पढ़ाई में होनहार थे। उन्होंने मुंबई के सिडेनहैम कॉलेज से कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया। बोर्डिंग स्कूल में उन्होंने सोलवां साल और मुगल-ए-आजम जैसी फिल्में देखीं, जिन्होंने उनके मन में सिनेमा के प्रति प्रेम जगा दिया।
Ramayana: जल्द पूरा होगा इंतजार, भव्य इवेंट में देखने को मिली रणबीर कपूर-साई पल्लवी की 'रामायण' की पहली झलक

विलेन बनकर की शुरुआत
विनोद खन्ना का फिल्मी सफर 1968 में सुनील दत्त की फिल्म मन का मीत से शुरू हुआ, जहां उन्होंने खलनायक की भूमिका निभाई। उनकी आकर्षक कद-काठी और गहरी आंखों ने दर्शकों का ध्यान खींचा। हालांकि, हीरो बनने का रास्ता आसान नहीं था। शुरुआती दिनों में उन्हें पूरब और पश्चिम, सच्चा झूठा, और मेरा गांव मेरा देश जैसी फिल्मों में नकारात्मक किरदार मिले। साल 1971 में हम तुम और वो में पहली बार सोलो लीड रोल मिला, जिसने उन्हें हीरो के रूप में स्थापित किया।

विनोद खन्ना की फिल्मी सीन का स्क्रीन ग्रैब - फोटो : यूट्यूब
70 के दशक में बिग बी से हुई तुलना
70 के दशक में विनोद खन्ना और अमिताभ बच्चन की जोड़ी बॉलीवुड की सबसे चर्चित जोड़ियों में से एक थी। दोनों ने अमर अकबर एंथनी, मुकद्दर का सिकंदर, हेरा फेरी, और परवरिश जैसी सुपरहिट फिल्मों में साथ काम किया। विनोद की स्क्रीन प्रेजेंस और अभिनय इतना दमदार था कि वह अमिताभ पर कई बार भारी पड़ जाते थे। समीक्षकों और दर्शकों ने अक्सर उनकी तुलना की और विनोद को अमिताभ का सबसे मजबूत प्रतिद्वंद्वी माना गया। साल 1978 में अमिताभ ने कुर्बानी फिल्म ठुकरा दी, जिसे विनोद ने स्वीकार किया। यह फिल्म विनोद के करियर की सबसे बड़ी हिट साबित हुई और उनकी लोकप्रियता को नई ऊंचाइयों पर ले गई। 

दो बार की शादी
विनोद खन्ना की लव लाइफ कॉलेज के दिनों से ही चर्चा में थी। गीतांजलि के साथ उनकी प्रेम कहानी थिएटर के मंच से शुरू हुई थी। वह उनकी पहली गर्लफ्रेंड और फिर पत्नी बनीं।  साल 1971 में हुई इस शादी से उनके दो बेटे, अक्षय खन्ना और राहुल खन्ना हुए। दोनों बॉलीवुड अभिनेता हैं। हालांकि शआदी के चार साल बाद यानी साल 1975 में विनोद के जीवन में आध्यात्मिक गुरु ओशो का प्रभाव बढ़ा। बाद में, वह मानसिक शांति की तलाश में ओशो के आश्रम चले गए। इस फैसले ने उनके परिवार को बिखेर दिया। साल 1985 में गीतांजलि से उनका तलाक हो गया। साल 1987 में बॉलीवुड में वापसी के बाद साल 1990 में विनोद ने कविता से दूसरी शादी की। इस शादी से उनके दो बच्चे, बेटा साक्षी और बेटी श्रद्धा हुईं।  उनकी दूसरी पत्नी कविता के साथ उनका रिश्ता अधिक स्थिर रहा और वह उनके अंतिम दिनों तक उनके साथ रहीं।

विनोद खन्ना - फोटो : अमर उजाला
स्टारडम छोड़कर बने माली
विनोद खन्ना ने 150 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। मेरे अपने, कुर्बानी, दयावान, और चांदनी उनकी यादगार फिल्में हैं। करियर के पीक पर उन्होंने ओशो के प्रभाव में फिल्में छोड़ दीं और अमेरिका में उनके आश्रम में माली का काम किया। ओशो ने उन्हें स्वामी विनोद भारती नाम दिया। पांच साल बाद, 1987 में वह फिल्म इंसाफ के साथ लौटे, लेकिन 70 के दशक का स्टारडम फिर हासिल नहीं हुआ। उनकी आखिरी फिल्म दिलवाले (2015) थी, जिसमें वह शाहरुख खान के साथ नजर आए। 

राजनीति में भी हासिल की सफलता
विनोद ने राजनीति में भी कदम रखा। 1997 से 2014 तक वह चार बार गुरदासपुर से बीजेपी सांसद रहे और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री भी बने। 1999 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड और 2018 में मरणोपरांत दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
विज्ञापन

लंबे समय तक कैंसर से लड़ी जंग
विनोद खन्ना लंबे समय तक ब्लैडर कैंसर से जूझते रहे। उन्होंने अपनी बीमारी को परिवार से छिपाया, खासकर इसलिए कि उनकी बेटी की परीक्षाएं चल रही थीं। छह साल तक जर्मनी में इलाज और सर्जरी के बावजूद वह इस बीमारी से उबर न सके। 27 अप्रैल 2017 को 70 साल की उम्र में मुंबई के एचएन रिलायंस अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। 

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें