किसी फिल्म के रिलीज से पहले होने वाला विवाद और सोशल मीडिया पर मचने वाली हाय तौबा होने के बावजूद सिनेमाहाल की टिकट की खिड़की तक लोग नहीं पहुंच पाते हैं। पिछले कुछ समय से बॉलीवुड में इस बात की पुख्ता धारणा बन रही थी कि फिल्मों की रिलीज से पहले वाले वाला विवाद फिल्मों के बिजनेस को बढ़ाता है। पर हाल में आई फिल्मों के नतीजों ने इसे गलत साबित किया है। पिछले एक-डेढ़ महीने में आई फिल्मों से एक बार फिर साबित हो गया कि आजकल हल्ला ज्यादा होता है और सिनेमाघरों में दर्शक कम पहुंचते हैं।
खास तौर पर पिछले महीने उड़ता पंजाब को लेकर जो कुछ हुआ, उसे देख कर यह कहने वालों की कमी नहीं थी कि फिल्म निर्माताओं की जेब भर देगी। हकीकत यह है कि फिल्म के निर्माता लागत तक नहीं निकाल सके हैं। फिल्म पचास करोड़ रुपये की बताई जा रही थी और पहले हफ्ते में इसने भारतीय टिकट खिड़की पर करीब 48 करोड़ रुपये बटोरे। दूसरे हफ्ते में इसका कलेक्शन 80 फीसदी गिर गया।
बुलबुला फूटने के बाद फिल्म की दो हफ्तों की कमाई 56 करोड़ रुपये के लभगभ रही और इसके प्रचार में मैदान थामने वालों ने यह कह कर तसल्ली की सांस ली, डार्क फिल्म ने पचास पार कर लिए! उड़ता पंजाब के हल्ले से अनुराग कश्यप को खूब चर्चा मिली। इसके अगले ही हफ्ते रिलीज हुई उनकी रमन राघव टिकट खिड़की पर बमुश्किल लागत निकाल सकी।
शोरगुल ने सिर्फ शोर ही मचाया
शोरगुल फिल्म रिलीज होने से पहले ही छाई विवादों में।
यह अनुराग की सबसे कम बजट फिल्म बताई जा रही है और पहले हफ्ते में इसका कारोबार सात से आठ करोड़ का रहा। वास्तव में फिल्में हल्ले से नहीं चलती। आजकल निर्माता सोशल मीडिया में फिल्मों को लेकर शोर मचाने की मुद्रा में रहते हैं। किसी न किसी तरह वे सुर्खियां पाना चाहते हैं।
पिछले हफ्ते रिलीज हुई जिमी शेरगिल-आशुतोष राणा स्टारर शोरगुल के यूपी के मुजफ्फरनगर दंगों पर आधारित होने की बात पर काफी विवाद हुआ। फिल्म की रिलीज तारीख दो बार आगे-पीछे हुई, ये तमाम बातें फिल्म को चर्चा दिलाने के बावजूद सफल नहीं बना सकी। शोरगुल पहले वीकेंड में बमुश्किल सवा करोड़ रुपये का कारोबार कर सकी।
वास्तव में ये दोनों फिल्में निर्माताओं के लिए सबक है कि अगर अच्छा कंटेंट है तो वह बॉक्स ऑफिस पर अपने आप काम करेगा, वर्ना कितना ही शोर मचाएं दर्शक नहीं आएंगे। पिछले महीने टिकट खिड़की पर एक और नजारा देखने को मिला। अगर आप फेसबुक और ट्विटर पर बहुत कामयाब भी हैं तो यह सफलता की गारंटी नहीं है।
अमिताभ बच्चन का भी नहीं चला जादू
तीन
नौ जून को रिलीज हुई महानायक अमिताभ बच्चन की फिल्म इसका उदाहरण है। उनकी फिल्म तीन को लेकर जोरदार प्रचार तो नहीं किया गया परंतु निर्माताओं ने सोशल मीडिया पर सीनियर बच्चन की लोकप्रियता का फायदा उठाना चाहा।
ट्विटर और फेसबुक समेत तमाम इंटरनेट साइटों पर फिल्म की बातें हुईं, मगर बच्चन के फॉलोअर फिल्म देखने नहीं पहुंचे। जबकि उनके काम की समीक्षकों ने खूब सराहना की थी।
स्पष्ट है कि आपका हर प्रशंसक आपकी फिल्म देखने नहीं जाता। ऐसे में निर्माताओं को सीखना चाहिए कि किसी सितारे की फैन फॉलोइंग के भरोसे उसे मोटी फीस न दें। वैसे तीन की नाकामी की एक वजह विद्या बालन को बताया गया, जिनके प्रशंसकों की संख्या में इधर काफी गिरावट आई है।
नवाजुद्दीन सिद्दिकी भी तीन में कमाल नहीं कर सके। इन फिल्मों से पहले इसी साल सरबजीत, अजहर, फोबिया, फेम, लव गेम्स, रॉकी हैंडसम, जुबान, फितूर, घायल वंस अगेन और अलीगढ़ जैसी फिल्मों को सोशल मीडिया पर खूब चढ़ाया गया और पाकिस्तान विरोध, खेल की कंट्रोवर्सी से लेकर सेक्स के मुद्दे उछाले गए। मगर इसके नतीजे फिल्मों के पक्ष में नहीं आए।