अब भी देश के बड़े हिस्से में स्वास्थ्य सुविधाएं गांव देहात तक पहुंची नहीं हैं। लोगों का भरोसा अब भी आयुर्वेद, मंत्रों और झाड़ फूंक में बना ही रहता है। सांप और बिच्छू के काटे जहर को निकालने के लिए देसी दवाइयां और मंत्रों का सहारा एक बड़ी आबादी अब भी लेती है। फिल्म 'द सॉन्ग ऑफ स्कॉर्पियन्स' की आत्मा भी यही है। लेकिन, बिच्छू काटे का जहर उतारने के लिए गाए जाने वाले कबीलाई गीत से आगे बढ़कर ये फिल्म प्रेम, त्याग, दर्द, करुणा और अपमान के समागम की बहुत ही खूबसूरत कहानी है। दुनिया भर में अपने अभिनय का लोहा मनवाने वाले अभिनेता इरफान खान की यह आखिरी फिल्म बताई जा रही है, और ये उनके निधन के तीन साल बाद रिलीज हो रही है। इरफान की बरसी के दिन ये रिव्यू लिखना भी अपने आप में भावुक कर देने वाला है।
फिल्म 'द सॉन्ग ऑफ स्कॉर्पियन्स' की कहानी राजस्थान के जैसलमेर की पृष्ठभूमि पर है, जहां आदिवासी इलाके में बिच्छू के डंक का इलाज गीतों द्वारा किया जाता है। आदिवासी महिला नूरान अपनी दादी जुबैदा से बिच्छू के डंक का इलाज करने के लिए गीत सीखती है। लेकिन उसके साथ गांव में एक ऐसा हादसा होता है कि अचानक गाना छोड़ देती है। गांव का ऊंट व्यापारी आदम उसकी गायकी से इतना प्रभावित होता है कि उसे शादी का प्रस्ताव देता है। शादी के बाद नूरान को एक और झटका लगता है, इससे उबरने में आदम किस तरह से नूरान की मदद करता है और दोनो की जिंदगी में क्या उतार चढ़ाव आता है, इसी के इर्द गिर्द पूरी फिल्म की कहानी घूमती है।
राजस्थान के जैसलमेर में थार रेगिस्तान की लहरदार सुनहरी रेत पर फिल्म कहानी को बहुत ही खूबसूरती के साथ पेश किया गया है। दिन के रेगिस्तान की कठोरता और रात को आकाश में तारों की टिमटिमाती रोशनी में कभी दर्द झलकता है तो कभी प्रेम की ठंडी फुहार का अहसास होता है। कभी अपमान से मन ही मन में घुटती एक नारी की व्यथा दिखती है, तो प्रतिशोध और क्षमा भी। फिल्म के लेखक- निर्देशक अनूप सिंह ने इन सभी भावों को बहुत ही खूबसूरती से पेश किया है तो वहीं, फिल्म के कलाकारों ने अपने प्रभावशाली अभिनय से उस किरदार को जीवंत कर दिया है।
इरफान खान ने फिल्म में ऊंट व्यापारी आदम का किरदार निभाया है। फिल्म में उनका अभिनय इतना प्रभावशाली रहा है, देखकर ऐसा नहीं लगता है कि अब वह हमारे बीच नहीं रहे। फिल्म में उनके बोले संवाद सीधे दिल को छूते हैं। ईरानी और फ्रांसीसी सिनेमा की अभिनेत्री गोलशिफतेह फरहानी ने फिल्म में नूरान का किरदार निभाया है। आदिवासी महिला के हिसाब से उनका मेकअप भले ही डार्क किया गया हो लेकिन उसमें भी उनकी खूबसूरती झलक कर आती है। गोलशिफतेह फरहानी के चाहे भावनात्मक सीन हो या फिर त्याग और अपमान का, हर दृश्य में उन्होंने अपना सौ प्रतिशत दिया है। दादी जुबैदा के किरदार में वहीदा रहमान को लंबे समय के बाद देखना न सिर्फ एक अलग अनुभव है बल्कि राजस्थानी लोक गीत भी उन्होंने खुद ही गाया है जिसे गाकर वह बिच्छू डंक से पीड़ित लोगों का इलाज करती हैं। फिल्म के बाकी कलाकारों का अभिनय भी संतोषजनक है।
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अभिनेता इरफान खान की फिल्म 'द सॉन्ग ऑफ स्कॉर्पियन्स' की शूटिंग दिसंबर 2015 में राजस्थान के जैसलमेर में फिल्म में हुई थी, लेकिन फिल्म अभी तक किसी कारणवश भारत रिलीज नहीं हो पाई थी। इस फिल्म का 9 अगस्त 2017 को स्विट्जरलैंड के लोकार्नो में 70वें लोकार्नो फिल्म समारोह में पियाजा ग्रैंड पर वर्ल्ड प्रीमियर हुआ था। इसके अलावा यह फिल्म दुनिया के तमाम फिल्म समारोहों में वाहवाही लूट चुकी है। साल 2019 में यह फिल्म यूरोप में रिलीज हुई थी। इस फिल्म को वहां खूब पसंद किया गया था। प्यार, जुनून और विश्वासघात की एक दिल दहला देने वाली कहानी में इरफान खान ने यादगार किरदार निभाए हैं।
किसी भी फिल्म को अच्छा बनाने में फिल्म की पूरी टीम का सौ फीसदी योगदान होता है। और, यह बात इस फिल्म में दिखती है। फिल्म के सिनेमैटोग्राफर पिएत्रो ज़ुएर्चर ने एक- एक दृश्य को बहुत ही खूबसूरती के साथ अपने कैमरे में कैद किया। फिल्म के ज्यादातर दृश्य रात में शूट गए हैं और फिल्म की लाइटिंग डिपार्टमेंट की इसमें मेहनत साफ झलकती है। फिल्म के दृश्य और किरदार के मुताबिक दिव्या गंभीर और निधि गंभीर ने कॉस्ट्यूम डिजाइन की है, जिसने आदिवासी किरदार के रूप में सभी कलाकार निखर कर आते हैं। मेकअप मैन गेराल्डिन ब्लैंको, धनंजय चोरघे और विजय शिकारे ने कलाकारों का मेकअप इतनी बारीकी से किया है कि क्लोज शॉट में रेगिस्तान के बाबू के एक- एक कण स्पष्ट रूप से नजर आते हैं। मदन गोपाल सिंह और ब्रिट्रिस थिरिट का संगीत आजकल की फिल्मों के घूम धड़ाम वाले संगीत से काफी अलग बहुत ही सकून देता है। बैकग्राउंड में भारतीय वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया है,जो फिल्म के दृश्य को काफी प्रभावशाली बनाते है।
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