असल मुंबई जिसे आम मुंबइया भाषा में ‘टाउन’ कहा जाता है, इसके निरे इलाके ऐसे हैं जहां आपको दिन रात युवा किसी कोने में दुबके एक चमकती पन्नी के नीचे आग जलाते हुए दिख जाएंगे। पन्नी पर पड़ा द्रव्य धुआं बनकर उड़ता है और ये बच्चे एक दूसरी दुनिया में पहुंच जाते हैं। ये असल ‘उड़ता मुंबई’ है, ‘उड़ता पंजाब’ से कहीं ज्यादा भयानक और कहीं ज्यादा विनाशकारी। लेकिन, ऐसा पहली बार हुआ है जब धुंआ उसी तरह उड़ रहा है जिधर के लोग अब तक दूसरी जगहों का धुआं निकालने में लगे रहे हैं।
ऐसा क्यों होता है कि फिल्मों की कहानियों में बार बार नेताओं, बिल्डरों और पुलिस वालों का चित्रण खलनायकों के तौर पर होता है और इनमें से कोई कुछ नहीं कहता। क्योंकि, मुंबई का एक बड़ा नेक्सस ही यही है। शहर की नई बनी इमारतों में आधे से ज्यादा फ्लैट खाली हैं। इन फ्लैट्स में दिन रात कोई न कोई धंधा पनपता रहता है। ओशिवारा में सरकारी अफसरों की सबसे चर्चित बिल्डिंग में जब भी छापा पड़ा कुछ न कुछ हैरान कर देने वाला ही सामने आया।
थोड़ी दूर और आगे टहलते हुए लोखंडवाला बैकरोड पर चले आइए। यहां शाम को हसीनाओं का मेला लगता है। शोहदे यहां टाइम पास करने आते हैं। स्ट्रगलर्स की पूरी बारात शाम को आपको यहां दिख सकती है। सब एक दूसरे को पिचकी हुई सिगरेटें पास करते रहते हैं। लिस्ट बनानी हो तो 25 तो क्या 250 जाने पहचाने चेहरे आपको यहीं मिल जाएंगे वह सब करते हुए जिसका पता लगाने के नाम पर रिया चक्रवर्ती को लोकल ट्रेन बना दिया गया है।
और, दमदार लोगों की अगर एनसीबी को तलाश हो तो कोकिलाबेन अस्पताल के आगे से दाहिने मुड़कर समंदर के किनारे तक जाने वाले रास्ते पर बस हफ्ता भर अपने स्टाफ की ड्यूटी लगाने की देर है, 250 वाली संख्या इतने दिन में ही डबल हो जाएगी। इसी इलाके में आराम नगर है, जिसके तमाम बंगलों में दिन रात गांजा, चरस और यहां तक कि हेरोइन की भी खपत होती है। सबको पेडलर्स पता हैं, सबको होम डिलीवरी करने वाले पता हैं।
धर्मनिरपेक्षता की बड़ी पहचान माना जाने वाला मंदिर मस्जिद मोड़ भी यही हैं। इस मोड़ पर खड़े होकर सिर्फ दो किमी के दायरे में अगर तलाशी ली जाए तो एनसीबी की दिल्ली टीम की आखें खुली की खुली रह सकती हैं। इसी इलाके में एक ऐसे फिल्म निर्माता का घर है जिसके यहां पार्टियों में बोरी भर गांजा खुलेआम टैरेस पर रख दिया जाता था। बताते हैं कि एक्टिंग के स्ट्रगलर्स से लेकर मीडिया के फैन ब्वॉय पत्रकारों तक का यहां अक्सर जमावड़ा देखा जाता था। पर, सब आनंद में रहे हैं। सब बाबा की बूटी पाकर परमानंद में जीते रहे हैं।