लोगों की सीमित सोच को चुनौती देती है सीरीज
मिथिला का मानना है कि 'सुपर सुब्बू' यौन शिक्षा के बारे में लोगों की सीमित सोच को चुनौती देता है। उन्होंने कहा कि जब आप यौन शिक्षा के बारे में सोचते हैं, तो आपके मन में इसके बारे में बहुत सीमित विचार आते हैं। लेकिन मुझे लगता है कि हम उन बहुत जरूरी चीजों के बारे में बात कर रहे हैं जो असल में इसका हिस्सा होनी चाहिए।
जैसे कि सहमति जिसके बारे में बिल्कुल बात नहीं की जाती और अपनी सीमाएं तय कर पाना। सहमति एक व्यापक बात है। 'ना का मतलब ना' हर चीज के लिए लागू होता है। हम भले ही इसे एक खास नजरिए से देख रहे हों, लेकिन सहमति हर उस चीज के लिए जरूरी है, जिसे आप नहीं करना चाहते।
मुझे लगता है कि हम इसके कई अलग-अलग पहलुओं पर बात कर रहे हैं। लेकिन हम कहीं भी यह नहीं कह रहे हैं कि 'बैठ जाओ, हम तुम्हें यह सिखाने की कोशिश कर रहे हैं।' इसे बिल्कुल भी उस तरह से नहीं किया जाता है।
गहरी सोच या कंडीशनिंग सबसे बड़ी वजह है
जब उनसे पूछा गया कि समाज आज भी ‘ना का मतलब ना’ जैसी आसान बात को समझने में क्यों संघर्ष करता है, तो मिथिला ने बरसों से चली आ रही सोच या कंडीशनिंग की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि हमने इस बारे में बात क्यों नहीं की या हम अभी भी इस बारे में अजीब क्यों महसूस करते हैं, इसकी वजह गहरी सोच या कंडीशनिंग है।
यह सबसे आसान एक-वाक्य वाला जवाब है। क्योंकि इतने साल से हमारा चित्रण ऐसा ही रहा है। ऐसा कभी नहीं होता कि 'ओह, उसने ना कहा।' हमेशा यही होता है कि उसने ना कहा, लेकिन 'उसके ना में हां है।' नजरिया यही रहा है।
आम तौर पर सभी सीमाओं का सम्मान नहीं किया गया है। सहमति को वास्तव में ध्यान में नहीं रखा गया है। कोई भी सोच या कंडीशनिंग जो इतने साल से इतनी गहरी हो, उसे बदलने में बहुत समय लगेगा।