सिनेमा के ओटीटी दौर ने हाशिये पर रहे जिन दमदार कलाकारों को सुपरस्टार बनाया है, उनमें पंकज त्रिपाठी का नाम सबसे आगे आता है। उनकी अदाकारी के लाखों दीवाने हैं। किरदार भी उन्हें फिल्मों और वेब सीरीज में शानदार मिल रहे हैं। लेकिन, पंकज त्रिपाठी अकेले अपने बूते एक पूरी फिल्म को खींच ले जाएंगे, उनसे ये उम्मीद करना उनके साथ भी थोड़ी ज्यादती ही है। निर्देशक सृजित मुखर्जी बांग्ला फिल्मों का बड़ा नाम रहे हैं। 12 साल के अपने फिल्मी सफर में वह अब तक 19 फिल्में बना चुके हैं। फिल्म ‘बेगम जान’ से उन्होंने हिंदी सिनेमा में कदम रखा। नेटफ्लिक्स की फिल्मावली ‘रे’ में भी उन्होंने किस्मत आजमाई और अब वह लेकर आए हैं, ‘शेरदिल: द पीलीभीत सागा’। क्रिकेटर मिताली राज के संघर्षों पर बनी उनकी एक और हिंदी फिल्म ‘शाबास मिट्ठू’ भी अगले महीने रिलीज होने वाली है। उत्तर प्रदेश स्थित दुधवा नेशनल पार्क के आसपास के गांवों में जानवरों और इंसानों के बीच होने वाले रोजमर्रा के संघर्ष की फिल्म ‘शेरदिल: द पीलीभीत सागा’ अच्छी कहानी हो सकती थी लेकिन सृजित मुखर्जी को हिंदी पट्टी का रंग ढंग समझने में अभी समय लगेगा।
विचार अच्छा, फिल्म खराब
सृजित मुखर्जी ने फिल्मकार सत्यजीत रे पर बड़ा काम किया है। उनकी कहानियों को नए सिरे से नए कलेवर में पिरोने की कोशिशें भी उनकी चलती रही हैं। फिल्म ‘शेरदिल: द पीलीभीत सागा’ में भी उन्होंने इंसानी फितरत का वह ढंग पकड़ने की कोशिश की है जिसमें सामाजिक तानेबाने की कड़वी सच्चाई जिंदगी पर कसे गए किसी तंज की शक्ल लेकर सामने आती है। ये कहानी है एक ऐसे गांव के सरपंच की जो जनहित के काम करना चाहता है। सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाता है और एक दिन उसके मन में एक ख्याल कौंधता है। सरकारी योजनाओं को अपने हिसाब से दुहने की कोशिशों में लगे रहने वाले ग्राम्य जीवन पर ये कहानी एक बड़ी चोट बनती दिखती है। सरपंच इसलिए जंगल चला जाता है कि बाघ उसका शिकार कर ले और सरकारी योजना से मिले मुआवजे से उसके गांव वालों का भला हो सके। जंगल में बाघ मिलने से पहले उसे एक शिकारी मिलता है। दोनों की बातचीत के बहाने सृजित बदलते दौर में घिसटती जिंदगी को प्रभावित करने वाले सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारकों पर टिप्पणी करते चलते हैं।
सृजन में चूके सृजित मुखर्जी
फिल्म ‘शेरदिल: द पीलीभीत सागा’ कथन के हिसाब से एक सृजित का अच्छा सृजन है लेकिन किसी विचार मात्र से उत्साहित हो जाना और उस विचार पर पूरी एक फीचर फिल्म बनाना दोनों दो विपरीत ध्रुवों तक सफर करने से कम नहीं है। सृजित ने अपने साथियों के साथ जो फिल्म लिखी है और जिस तरह से उसे फिल्माया है, वही इस फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है। लखीमपुर खीरी और पीलीभीत की आंचलिक भाषा का पुट लिए ये फिल्म अगर पूरी जमीनी ईमानदारी से बनी होती तो इसका नतीजा ही कुछ और होता। लेकिन, एक बौद्धिक फिल्म बनाने के चक्कर में सृजित ने इसके मनोरंजन के तत्व को हल्का कर दिया है। वह कहानी का केंद्र बिंदु तो आखिर तक बनाए रखते हैं लेकिन कहानी की परिधि बार बार बदलती रहती है और इसी गड़बड़ी के चलते फिल्म बोझिल बन जाती है।