अंजना वेलफेयर सोसायटी के सहयोग से रिदम कला महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। इस महोत्सव के दौरान संगीत एवं नृत्य की कार्यशाला आयोजित की जा रही है। 26 जनवरी से शुरू हुआ यह कला महोत्सव 45 दिन तक आयोजित किया जाएगा। यह कला महोत्सव बीते 8 सालों से आयोजित किया जा रहा है और आगे भी ऐसे ही आयोजित किया जाएगा। इस महोत्सव का मकसद युवाओं को भारतीय संस्कृति से जोड़ना है। इस महोत्सव के तहत हर सप्ताहांत में कला के क्षेत्र से जुड़े व्यक्ति इस महोत्सव के तहत आयोजित होने वाली कार्यशाला का हिस्सा बनते हैं।
इसी क्रम में इस सप्ताहांत आयोजित हुई कार्यशाला में बतौर मेहमान नजर आए संगीत नाटक अकादमी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता संजय मेहता जी। इस दौरान अंजना वेलफेयर सोसाइटी की फाउंडर कत्थक नृत्यांगना माया कुलश्रेष्ठ ने कहा कि संस्था की यह कोशिश है कि कला के क्षेत्र से जुड़े ऐसे कलाकारों का मार्गदर्शन आगे आने वाले युवाओं को मिले जो कला के क्षेत्र में आना चाहते हैं या इससे जुड़ना चाहते हैं। इस दौरान संजय मेहता जी से बातचीत करते हुए माया कुलश्रेष्ठ ने उनसे सवाल- जवाब भी किए।
सवाल: जब आपने रंगमंच में आने के बारे में सोचा तो इस बारे में आप का विचार क्या था और इसके लिए आप की प्रेरणा क्या थी?
जवाब: जबलपुर के कटनी जिले में जहां मैं पढ़ रहा था, उस समय थिएटर जैसी कोई चीज हुआ ही नहीं करती थी। ऐसे में इस बारे में कुछ सोचने का विषय ही नहीं था। इसके बाद मैं वहां से पढ़ाई करने के लिए उज्जैन गया। उस समय उज्जैन में मध्य प्रदेश नाटक लोक कला एकेडमी थी और वहां रंग समूह के नामक एक समूह भी था। मैं वहां से जुड़ा और मैंने मध्यप्रदेश नाटक लोक कला एकेडमी से डिप्लोमा शुरू किया और वही से नाटक की तरफ मेरा रुझान बढ़ा।
सवाल: 17 साल के अपने लंबे करियर में अपने 200 से ज्यादा थिएटर का डायरेक्शन और उसमें अभिनय किया है, लेकिन आपके परिवार में अभिनय या नाटक का कोई बैकग्राउंड नहीं था। ऐसे में क्या आपको कभी यह नहीं लगा कि यह आपके लिए पार्ट टाइम विकल्प हो सकता है बजाय फुल टाइम करियर के?
सवाल: आपने रंगमंच के अलावा कई फिल्मों में भी काम किया है। ऐसे में जब आप रंगमंच से फिल्मों की तरफ आते हैं, तो दोनों में क्या अलग होता है। क्योंकि आजकल ज्यादातर लोगों की यही धारणा है कि रंगमंच इसलिए करना है, क्योंकि फिल्मों में जाना है, तो इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
सवाल: जैसा कि आजकल देखने को मिलता है कि अभिनय के लिए कई तरह के क्रैश कोर्स उपलब्ध है, तो आपको लगता है कि अभिनय सिखाया जा सकता है या अभिनय का हुनर जन्म से ही मिलता है? साथ ही अभिनय करने या अभिनेता बनने के लिए व्यक्ति में कौन-कौन सी खूबियां होनी चाहिए?
सवाल: आजकल बॉलीवुड फिल्मों का क्रेज थोड़ा कम होता दिख रहा है। पहले के मुकाबले आजकल लोग इसकी तरफ कम आकर्षित लग रहे हैं। क्या यह रंगमंच के लिए एक अच्छा संकेत हो सकता है?