करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुईं ये फिल्में
मुंबई पहुंचने के बाद वासिक ने कमालिस्तान स्टूडियो में बैकड्रॉप पेंटर के रूप में करियर शुरू किया। बाद में समीर चंदा के साथ उन्होंने मणिरत्नम की तमिल फिल्म 'इरुवार' (1997) और श्याम बेनेगल की 'हरी-भरी' (2000) में काम किया। यह उनके करियर का टर्निंग पॉइंट था।
अनुराग कश्यप की फिल्मों में दिया खास योगदान
वासिक ने अनुराग कश्यप की फिल्मों में अपने सेट्स से अलग पहचान बनाई। उनकी फिल्में 'दैट गर्ल इन येलो बूट्स' (2011) और 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' (2012) में सेट्स ने कहानी को जीवंत कर दिया था। 'ब्लैक फ्राइडे' (2004), 'नो स्मोकिंग' (2007), और 'गुलाल' (2009) जैसी फिल्मों में उनके काम ने अनुराग कश्यप की फिल्मों को एक खास विजुअल स्टाइल दिया। 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' ने उन्हें खूब वाहवाही दिलाई।
इन फिल्मों से भी छोड़ी छाप
वासिक ने सिर्फ आर्ट फिल्मों तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने सलमान खान की सुपरहिट फिल्मों 'वॉन्टेड' (2009) और 'दबंग' (2010) में भी अपने सेट्स का जादू दिखाया। 'दबंग' के लिए उन्होंने 100 से ज्यादा स्केच बनाए, जो हर सेट को बारीकी से दर्शाते थे। संजय लीला भंसाली की 'गोलियों की रासलीला राम-लीला' (2013) और 'रांझणा' (2013) में उनके भव्य और रियलिस्टिक सेट्स ने दर्शकों का दिल जीता। उन्होंने 'टैक्सी नंबर 9211' (2006), 'तनु वेड्स मनु' (2011), और 'तेरे बिन लादेन' (2010) जैसी फिल्मों में भी काम किया। 'तेरे बिन लादेन' के लिए उन्होंने मुंबई के फिल्म सिटी में पाकिस्तान के एबटाबाद शहर को दोबारा बनाया, जबकि 'लम्हा' (2010) के लिए कश्मीर से दो ट्रक चिनार के पत्ते मंगवाए थे।