राजपाल ने पैसे देने की बजाय जेल जाना चुना
हाई कोर्ट ने दर्ज किया कि मामला तब निर्णायक मोड़ पर पहुंचा, जब सुनवाई के आखिर में राजपाल यादव ने साफ तौर पर कोर्ट को बताया कि वह शिकायतकर्ता को कोई रकम देने को तैयार नहीं हैं और पैसे लौटाने के बजाय पांच बार जेल जाना पसंद करेंगे।
इस बयान का जिक्र करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि हालांकि कोई भी पैसे लौटाने के बजाय जेल जाना चुन सकता है, यह उसकी अपनी मर्जी है। कानून कोई ऐसी स्क्रिप्ट नहीं है, जिसे किसी एक्टर की मर्जी से दोबारा लिखा जा सके और न ही रणनीति बदलने के साथ कानूनी स्थिति को बदला जा सकता है।
कोर्ट कानूनी सिद्धांतों के आधार पर फैसला करते हैं और हर मुकदमेबाज़ से निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति सम्मान की उम्मीद करते हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसा व्यवहार सहानुभूति या रियायत का हकदार नहीं है।
इसलिए कोर्ट ने राजपाल की 'प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट' के तहत प्रोबेशन पर रिहाई की अर्जी खारिज कर दी। कोर्ट ने माना कि मामले के तथ्यों को देखते हुए वह प्रोबेशन के फायदे का हकदार नहीं था।
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की उस कोशिश को भी खारिज कर दिया, जिसमें वे आपराधिक रिविजन याचिकाएं दाखिल करने में हुई पांच साल से ज्यादा की देरी को माफ करवाकर अपनी सजा के खिलाफ चुनौती को फिर से शुरू करना चाहते थे।