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‘कानून स्क्रिप्ट नहीं जिसे एक्टर की मर्जी से फिर लिखा जाए’, राजपाल यादव को सजा सुनाते हुए कोर्ट ने कही ये बात

Fri, 10 Jul 2026 11:08 PM IST
Aradhya Tripathi एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

Rajpal Yadav Cheque Bounce: राजपाल यादव के चेक बाउंस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला देते हुए कड़ी टिप्पणी की। जानिए कोर्ट ने क्या कुछ कहा…
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राजपाल यादव - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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चेक बाउंस मामले को लेकर अभिनेता राजपाल यादव एक बार फिर चर्चाओं में हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने आज एक कड़े फैसले में मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के साथ वित्तीय विवाद से जुड़े कई चेक बाउंस मामलों में राजपाल और उनकी पत्नी राधा राजपाल यादव की सजा और दोषसिद्धि को बरकरार रखा।

रियायत मिलने के बावजूद वादे पूरे करने में नाकाम रहे राजपाल

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इस जोड़े द्वारा दायर 21 याचिकाओं को खारिज करते हुए जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने ट्रायल कोर्ट और सेशंस कोर्ट के फैसलों में दखल देने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि कई साल तक कोर्ट से बहुत ज्यादा रियायत मिलने के बावजूद याचिकाकर्ता बार-बार अपने वादे पूरे करने में नाकाम रहे, जिससे कोर्ट को आखिरकार उन्हें जेल अधिकारियों के सामने सरेंडर करने का आदेश देना पड़ा।

कोर्ट ने सुनवाई के दौरान राजपाल यादव के व्यवहार पर कड़ी टिप्पणी की। कोर्ट ने गौर किया कि भले ही पिछली बेंच ने पहली सुनवाई में ही संकेत दे दिया था कि वह मामले के गुण-दोष के आधार पर दोषसिद्धि में दखल देने की इच्छुक नहीं है, फिर भी शिकायतकर्ता के साथ विवाद को आपसी सहमति से सुलझाने की इच्छा जताने पर कोर्ट ने उनकी सजा को सस्पेंड कर दिया था।
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फैसले के मुताबिक, राजपाल यादव ने पैसे का इंतजाम करने के लिए बार-बार समय मांगा और व्यक्तिगत रूप से तथा अपने सीनियर वकील के जरिए कई बार कोर्ट को भरोसा दिलाया कि वह शिकायतकर्ता का पैसा लौटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इन आश्वासनों पर भरोसा करते हुए, कोर्ट ने उन्हें बार-बार सुनवाई टालने की इजाजत दी और सजा सस्पेंड करके उन्हें सुरक्षा दी।

राजपाल यादव - फोटो : सोशल मीडिया

राजपाल ने पैसे देने की बजाय जेल जाना चुना
हाई कोर्ट ने दर्ज किया कि मामला तब निर्णायक मोड़ पर पहुंचा, जब सुनवाई के आखिर में राजपाल यादव ने साफ तौर पर कोर्ट को बताया कि वह शिकायतकर्ता को कोई रकम देने को तैयार नहीं हैं और पैसे लौटाने के बजाय पांच बार जेल जाना पसंद करेंगे।

इस बयान का जिक्र करते हुए जस्टिस शर्मा ने कहा कि हालांकि कोई भी पैसे लौटाने के बजाय जेल जाना चुन सकता है, यह उसकी अपनी मर्जी है। कानून कोई ऐसी स्क्रिप्ट नहीं है, जिसे किसी एक्टर की मर्जी से दोबारा लिखा जा सके और न ही रणनीति बदलने के साथ कानूनी स्थिति को बदला जा सकता है।

कोर्ट कानूनी सिद्धांतों के आधार पर फैसला करते हैं और हर मुकदमेबाज़ से निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति सम्मान की उम्मीद करते हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसा व्यवहार सहानुभूति या रियायत का हकदार नहीं है।

इसलिए कोर्ट ने राजपाल की 'प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट' के तहत प्रोबेशन पर रिहाई की अर्जी खारिज कर दी। कोर्ट ने माना कि मामले के तथ्यों को देखते हुए वह प्रोबेशन के फायदे का हकदार नहीं था।

हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की उस कोशिश को भी खारिज कर दिया, जिसमें वे आपराधिक रिविजन याचिकाएं दाखिल करने में हुई पांच साल से ज्यादा की देरी को माफ करवाकर अपनी सजा के खिलाफ चुनौती को फिर से शुरू करना चाहते थे।

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राजपाल यादव - फोटो : इंस्टाग्राम-@rajpalofficial
कोर्ट ने अर्जी खारित करते हुए कही ये बात
जस्टिस शर्मा ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का यह तर्क कि उन्हें लगा था कि उनकी सजा को पहले ही चुनौती दी जा चुकी है, न तो रिकॉर्ड से साबित होता है और न ही उस पर भरोसा किया जा सकता है।

देरी के लिए पूरी तरह से पिछले वकील की गलत कानूनी सलाह को जिम्मेदार ठहराना, इतनी ज्यादा देरी को माफ करने का पर्याप्त कारण नहीं है। कोर्ट ने पाया कि इस स्पष्टीकरण में ईमानदारी की कमी है, इसलिए देरी माफ करने की सभी अर्जियां खारिज कर दीं और नतीजतन संबंधित आपराधिक रिविजन याचिकाएं भी खारिज कर दीं।

इस तरह, कोर्ट ने 21 जनवरी 2019 के सेशंस कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद हाई कोर्ट ने सेशंस कोर्ट के 29 मई 2024 के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार किया।

सेशंस कोर्ट ने चेक बाउंस मामलों में सुनाई गई सजा को बरकरार रखा था और सजा के आदेश में बदलाव किया था। याचिकाकर्ताओं द्वारा उठाए गए कानूनी मुद्दों का विश्लेषण करने के बाद, कोर्ट ने माना कि सजा या सजा के आदेश में कोई ऐसी कमी नहीं थी, जिसके लिए अपने अधिकार क्षेत्र के तहत दखल देने की जरूरत हो।

राहत देने से इनकार करते हुए कोर्ट ने गौर किया कि हाई कोर्ट में याचिकाएं लंबित रहने के दौरान, याचिकाकर्ताओं ने 2.25 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि जमा की थी, जिसे शिकायतकर्ता कंपनी को पहले ही जारी किया जा चुका है।
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