विश्वास पाटिल मानते हैं कि मुजरा नृत्य कला का एक रूप है। इसे हमारे बीच रहना चाहिए। लेकिन मुजरे की आड़ में कोठों पर होने वाली वेश्यावृत्ति बंद होनी चाहिए।
सम्मानित साहित्यकार होने के साथ उन्हें प्रशासनिक सेवा का लंबा अनुभव है। उनके विचारों और फिल्म दोनों में यह बात झलकती है।
परंतु फिल्म के निर्माण और निर्देशन के लिए एक खास किस्म की धार सोच में चाहिए, उसका अभाव पाटिल की पहली फिल्म ‘रज्जो’ में साफ दिखता है। वह न कला का अच्छा नमूना बन पाती है और न ही कॉमर्शियल फिल्म।
फिल्म मुंबई में एक सेक्स वर्कर रज्जो (कंगना रनोट) की कहानी है जो कुशल नृत्यांगना है। नृत्य की आराधना करती है। अपना जीवन नृत्य को समर्पित करना चाहती है। बचपन में उसे कोठे पर बेच दिया गया था। कैसे वह कोठे के नर्क से निकलती है और तमाम संर्घषों के बीच अपने लक्ष्य को हासिल करने की तरफ बढ़ती है... यही ‘रज्जो’ में बताया गया है।
मुख्य कथा को रज्जो से कहीं कम उम्र के चंदू (पारस अरोड़ा) के प्यार का आधार मिला है। वह रज्जो से शादी करता है। परिवार उसे स्वीकार नहीं करता और उसके कमसिन दोस्तों की टोली मदद नहीं कर पाती। इसके अलावा खूबसूरत रज्जो पर इलाके के कारपोरेटर (प्रकाश राज) की भी नजर है। वह रज्जो को बार डांसर बना देना चाहता है।
विश्व सिनेमा के विपुल ज्ञान के बावजूद पाटिल अपनी फिल्म को ऊंचाइयों तक नहीं ले जा पाते, तो इसका कारण एक यह है कि कहानी हकीकत और फंतासी जैसी दुनिया के बीच झूलती है। फिल्म की एक समस्या यह भी है कि आज सेक्स वर्करों का बाजार कोठों और लाल-बत्ती इलाकों से बाहर निकल कर नए-नए रूप धर चुका है।
ऐसे में कोठे को लेकर कही गई कहानी अपनी संरचना में पुरानी मालूम पड़ती है। कुछ समस्याएं किरदारों के साथ हैं। कोठों पर लड़कियों को कठोरता से नियंत्रित करने वाली बेगम (महेश मांजरेकर) रज्जो (कंगना रनोट) और उसके कमसिन प्रेमी चंदू (पारस अरोड़ा) को लेकर एकदम नर्म पड़ जाती है।
युवकों को वेश्याओं से विवाह करने वाले एक नेता को कोसने वाली बेगम खुद रज्जो को उसके प्रेमी के साथ सात फेरे दिलाती है। नेता का चरित्र फिल्म में संदिग्ध होकर उभरता है, लेकिन वह इसकी आड़ में क्या खेल कर रहा है, क्या पाना चाहता है, वह सूत्र गायब है।
फिल्म में कसावट नहीं है और कंगना नृत्य के अलावा प्रभावित करने में नाकाम रहती हैं। जबकि पारस अरोड़ा अपनी भूमिका से उम्मीद जगाते हैं। महेश मांजरेकर और प्रकाश राज जैसे अभिनेता अपने अंदाज में काम करते हैं और प्रशंसा पाते हैं। फिल्म के सैट खूबसूरत हैं।
सिनेमैटोग्राफी बढ़िया है। संगीत इसका उज्ज्वल पक्ष है। फिल्म सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के दर्शकों को जरूर अच्छी लग सकती है, लेकिन मल्टीप्लेक्स के दर्शकों की दुनिया अलग है।