सभ्यता के रूप में हम चाहे जितने पुराने हों लेकिन लोकतंत्र के रूप में अभी हमारी उम्र कच्ची है। हम दसवीं-बारहवीं में पढ़ने वाले किसी कमसिन किशोर की तरह हैं। कुछ ऐसी बातें हैं जिन्होंने हमें सामाजिक-सांस्कृतिक तरक्की से रोक रखा है।
जाति प्रथा, सामंती सोच, संस्कृति या मर्यादा के नाम पर पाखंड करना हमारी सभ्यता के कोढ़ हैं। जब तक ये पूरी तरह खत्म नहीं होंगे, हम संपूर्ण समाज के रूप में तरक्की नहीं कर सकेंगे। समाज में वर्ग बने रहेंगे। एक तरफ हम मॉडर्न हो रहे हैं। दूसरी तरफ पुराने पाखंड छोड़े नहीं जा रहे हैं।
अच्छा है कि आप खुद को पांच-छह हजार या चाहे जितनी पुरानी सभ्यता बताएं लेकिन कब तक यह गाते रहेंगे कि आपने शून्य की खोज की। महत्वपूर्ण यह है कि आज नए जमाने में आपने क्या नया आविष्कार किया?
मुझे लगता है कि हम बहुत झूठ बोलते हैं। खुद से, दूसरों से, बाहर के लोगों से। हमारी आधुनिकता और परंपरा के बीच गहरे संघर्ष हैं।
हम रेस्तराओं से अपनी लड़कियों को निकाल कर उन्हें पीटते हैं, उनके कपड़े फाड़ते हैं और भारत माता की जय के नारे लगाते हैं, यह हमारा असली चेहरा है।
मुझे नई पीढ़ी से उम्मीद है। हर नई पीढ़ी कुछ पिछली चीजें छोड़ती है, कुछ नई अपनाती है। वह चीजों को बदलने की तरफ बढ़ चुकी है। उसके पास जात-पात के लिए समय नहीं है, उसके पास सामंती सोच को पालने-पोसने का वक्त नहीं है।
वह मन की धुन पर जीती है। उसे कुछ पसंद आ गया तो आ गया। करप्शन और करप्ट सिस्टम के खिलाफ जो लड़ाई देश में छिड़ी है, वह उसका अभिन्न हिस्सा बन कर उभरी है। उसमें आक्रोश है।
आज का जो समय है, उसमें लोग केंद्र और राज्यों की सरकार से सवाल पूछने लगे हैं। वे सड़कों पर उतरने लगे हैं। हमें कभी कभी लगता है कि क्या यह सही तरीका है? क्या सड़कों पर कानून बन सकते हैं?
लेकिन सच ये है कि यह लोकतंत्र के मैच्योर होने की तरफ बढ़ने से आ रही शुरुआती तकलीफें हैं। जैसे बच्चे को दांत निकलते वक्त होती हैं। टीथिंग ट्रबल्स। थोड़ा बुखार भी होता है, लेकिन यह अच्छे संकेत हैं।
अब लोकल स्तर से लेकर केंद्र तक सरकारों को समझ आने लगा है कि पहले जैसे काम नहीं चल सकता। पहले उनके मन में सामंती सोच के खूंटे गड़े थे। किसी का कोई डर नहीं था।
उन्हें लगता था कि हम चुनाव जीत गए, पार्लियामेंट में पहुंच गए, हम देख लेंगे कि सबके लिए क्या अच्छा है। जवाब तो पांच साल बाद देना होगा।
अब ऐसा नहीं है। वे जानते हैं कि बीच में ही जवाब मांगा जा सकता है। अब अच्छे नेताओं और अच्छे अफसरों को बढ़ावा देने का समय है। बड़े जनांदोलनों के साथ अब ऐसे नेता सामने आएंगे, जिनकी स्वीकृति सबमें होगी।
पिछले पंद्रह-सत्रह सालों में चीजें बहुत तेजी से बदली हैं। दूरसंचार क्रांति हुई, केबल क्रांति हुआ, सैटलाइट क्रांति हुई। इन्होंने समाज के चरित्र में भी परिवर्तन किए हैं।
दुखद पक्ष यह है कि आदमी सिर्फ अपने बारे में सोचने लगा है। बड़े घोटाले इसी का नतीजा हैं। सब अपने घरों में पानी की टंकियां और पंप लगा कर बैठे हैं।
हमारी फीलिंग ऑफ कम्युनिटी, वन नेशन, वन पीपुल टूटती जा रही है। बड़े शहरों ने कस्बों-गांवों से दूरियां बना ली हैं।
जब हमारी क्रिकेट टीम जीतती है या मुंबई में आतंकी हमला होता है तब तो हम एक हो जाते हैं, लेकिन जब माइनिंग के लिए या बांध बनाने के लिए गांव के गांव उजाड़ दिए जाते हैं तब हमारे भीतर कोई हलचल नहीं होती।
मुझे लगता है कि देश के मध्यम वर्ग की सोच ज्यादा आत्मकेंद्रित हुई है। उसकी आर्थिक संपन्नता इधर जितनी बढ़ी है, जितना वह ग्लोबली कनेक्ट हुआ है, उतना ही अपने में सिमटता जा रहा है। वह भारत के भीतर एक नए देश की तरह उभर रहा है। यह अच्छा संकेत नहीं है।
याद करें कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम के ज्यादातर नेता इसी मध्यम तबके से आए थे। आज के मध्यम वर्ग को देख कर मुझे लगता है कि मॉल्स, मल्टीप्लेक्स, चुनिंदा ब्रांड्स, दस-बारह गिनती के टीवी चैनल और आठ-दस फिल्मी सितारे ही उसका इंडिया हैं। वह अपने से दो सौ किलोमीटर छोड़िए, बीस किलोमीटर आगे की स्थिति भी नहीं जानता।
इन बातों के बावजूद मैं निराश नहीं हूं। गुलजार साहब ने मेरी फिल्म ‘बंटी और बबली’ के एक गीत में बहुत अच्छी पंक्तियां लिखी थी... छोटे छोटे शहरों से, खाली बोर दोपहरों से हम तो झोला उठा के चले।
ये उस नौजवान पीढ़ी का गीत है, जो अपने कस्बों-गांवों में असंतुष्ट मचल उठी है। जिसकी उम्मीदें और सपने रोशनी की रफ्तार से आकाश की ऊंचाई छू रहे हैं और जिसके पास मौके इंडियन रेलवे की गति से आ रहे हैं।
ऐसे में यह नई पौध जहां है, वहां से निकल रही है। ज्यादा दिन नहीं, पांच साल रुकिए। गांव-गांव के घर-घर में भी जब इंटरनेट पहुंच जाएगा तब देखिएगा। आज उनके पास मौके कम हैं, लेकिन भूख बहुत है। ये निकलेंगे वहां से। यही आपको गर्व करने का मौके देंगे।
आज आप ऐसे समाज में रह रहे हैं जो अपनी कमियां मानने को तैयार नहीं है। कोई आपसे आपकी कमी बताता है तो झंडा उठा कर मुंह छुपा लेते हैं। कोई अपनी आत्मा में झांक लेने को कहता है तो भारत माता की जय कह कर खड़े हो जाते हैं।
अपने लालच पूरे करने के लिए देश के संसाधनों का इस्तेमाल करते है। आज हम जिस समाज में रह रहे हैं उसे देखते हुए मुझे लगता है कि इसका कोई सटीक सिनेमाई चित्रण हो सकता है, तो राग दरबारी।
पाखंडी समाज में तो आप राग दरबारी ही बना सकते हैं।
(जयदीप, चक दे इंडिया और खोसला का घोंसला जैसी फिल्मों के लेखक हैं)