महीना भर भी नहीं हुआ जब अपने 80वें जन्मदिन पर 27 सितंबर को यश चोपड़ा ने फिल्म निर्देशन से संन्यास लेने की घोषणा की थी। तब बॉलीवुड को आश्चर्य जरूर हुआ था, पर फिल्मकारों के मन में तसल्ली थी कि ‘यशजी’ उनका मार्गदर्शन करते रहेंगे। लेकिन रविवार को यश चोपड़ा के निधन की खबर अचानक आई और सब स्तब्ध रह गए।
हिंदी फिल्मों के इतिहास में कामयाबी की सबसे ज्यादा धूम मचाने वाला निर्देशक दबे पांव चला गया। जबकि दर्शक उनकी फिल्म ‘जब तक है जान’ का बेसब्री इंतजार कर रहे हैं। बीते पांच दशक से युवा पीढ़ियों को रोमांस के नए अंदाज सिखाने वाले यश चोपड़ा का लीलावती अस्पताल में निधन हुआ। वह 80 वर्ष के थे।
डेंगू के लक्षण दिखाई देने के बाद उन्हें 14 अक्तूबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल सूत्रों ने बताया कि वे आईसीयू में थे। बीच में ऐसा लगा था कि उनका स्वास्थ सुधर रहा है, लेकिन रविवार को उनके कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया, जिसके कारण उनकी मौत हो गई।
यश चोपड़ा के परिवार में उनकी पत्नी पामेला और दो पुत्र आदित्य और उदय हैं। यश चोपड़ा का जन्म 27 सितंबर, 1932 को अविभाजित हिंदुस्तान के लाहौर में हुआ था। रुपहले पर्दे पर रोमांस के अनेक रूपों को जीवंत करने वाले यश चोपड़ा ने पिछले पांच दशक में हर दौर के प्रेम को विशिष्ट अभिव्यक्ति दी।
उन्होंने हिंदी सिनेमा को दाग, कभी कभी, सिलसिला, चांदनी, लम्हे, दिल तो पागल है और वीर जारा जैसी यादगार रूमानी फिल्में दी। वहीं दीवार, त्रिशूल और काला पत्थर जैसी एक्शन फिल्मों में भी अपने निर्देशन का जौहर दिखाया। आधी सदी से भी अधिक युवाओं के दिलों पर राज करने वाले निर्माता-निर्देशक-लेखक यश चोपड़ा अपनी फिल्मों में प्रेम दृश्यों को इतनी गहराई और स्वाभाविकता से उतारते थे कि हर किसी को उसमें अपनी कहानी नजर आने लगती थी।
उन्होंने गुजरे जमाने के मशहूर निर्देशक आईएस जौहर और अपने बडे़ भाई बीआर चोपड़ा के सहायक के रूप में करियर की शुरुआत की थी। 1959 में राजेंद्र कुमार और माला सिन्हा अभिनीत ‘धूल का फूल’ से अपने निर्देशकीय पारी की शुरुआत की थी। जबकि मल्टीस्टारर ‘वक्त’ (1965) उनकी पहली सुपरहिट फिल्म थी। इस फिल्म की कामयाबी के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और एक के बाद एक हिट फिल्में देते रहे। निर्देशक के रूप में उनकी 22वीं फिल्म ‘जब तक है जान’ इस दीपावली पर रिलीज के लिए तैयार है।
- प्रमुख फिल्में : वक्त, दाग, दीवार, कभी कभी, त्रिशूल, काला पत्थर, सिलसिला, मशाल, चांदनी, लम्हे, डर, दिल तो पागल है
- सम्मान : दादा साहेब फाल्फे (2001), पद्म भूषण (2005), फिल्म फेयर (13 बार)