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जानिए लाखों लोगों को कैसे पढ़ना-लिखना सिखा रही टीवी और फिल्मों की दीवानगी?

Wed, 04 Oct 2017 03:25 PM IST
amarujala.com, Presented by: आनंद
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2011 की जनगणना के मुताबिक, भारत में 78 करोड़ लोग साक्षर हैं। मगर आप ये जानकर हैरान हो जाएंगे, कि इनमें से करीब 40 करोड़ लोग ऐसे थे, जो बमुश्किल अपना नाम लिख पाते थे। यानी ये सिर्फ नाम के पढ़े-लिखे हैं।
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जब देश की एक तिहाई आबादी निरक्षर हो और एक तिहाई आबादी सिर्फ नाम की पढ़ी-लिखी तो वाकई फिक्र की बात है। सरकार और तमाम स्वयंसेवी संगठन लोगों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं, ताकि लोग दस्तखत करने के सिवा पढ़ने-लिखने के और भी काम खुद से कर सकें। इस काम में टीवी काफी मददगार हो सकता है। आप पूछेंगे, वो कैसे? इसका भी जवाब मिलेगा। जरूर मिलेगा।

अब ये तो कमोबेश सब को पता है कि हिंदुस्तान के लोग फिल्मों के दीवाने हैं। सिनेमाघरों में जाकर फिल्में देखते हैं। टीवी पर फिल्में देखते हैं और गाने सुनते हैं। आज टेलिविजन देश में मनोरंजन का सबसे बड़ा जरिया है। पढ़े-लिखे हों या निरक्षर, सभी टीवी देखते हैं। ऐसी ही एक महिला हैं महाराष्ट्र की यशोदा लक्ष्मण केनी।
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यशोदा रोजाना कई घंटे टीवी देखती थीं। टीवी देखते-देखते वो अच्छा-खासा पढ़ने-लिखने लगी हैं। जबकि पहले वो बमुश्किल अपना दस्तखत कर पाती थीं। असल में टीवी देखते वक्त जो गाने चलते थे, उनके गीत के बोल भी टीवी स्क्रीन पर लिखे हुए आते थे। उनको पढ़ने की कोशिश करते-करते यशोदा को काफी कुछ पढ़ना और लिखना आ गया।
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रोजाना औसतन 3 घंटे टेलीवीजन देखते हैं

देश में जो 78 करोड़ लोग साक्षर हैं, वो रोजाना औसतन 3 घंटे टेलीविजन देखते हैं। बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो गुजराती, मराठी या दूसरी देसी भाषाएं बोलते-समझते हैं। मगर वो बॉलीवुड फिल्मों के भी शौकीन हैं।

ऐसे में बहुत से टीवी चैनल उनके लिए सब-टाइटल वाले गाने प्रसारित करते हैं। यानी जब गाने चलते हैं, तो उनके बोल भी स्थानीय भाषा में लिखकर स्क्रीन पर चलते रहते हैं। यशोदा जैसे बहुत से लोग हैं, जो इन बोलों को पढ़कर, अपनी पढ़ाई का स्तर बेहतर कर रहे हैं।

जैसे गुजरात की छायाबेन सोंधा। वो सिर्फ गुजराती समझ पाती थीं। लेकिन वो टीवी पर रोज रंगोली नाम का कार्यक्रम देखती थीं। रंगोली के प्रसारण में वो गाने के बोल पढ़ने की कोशिश करने लगीं। धीरे-धीरे उनकी पढ़ाई काफी सुधर गई। अब छायाबेन अपने बहुत से फॉर्म खुद भर लेती हैं। साफ है कि देश के करीब चालीस करोड़ निरक्षर लोगों के लिए टेलीवीजन, साक्षरता का बड़ा जरिया बन सकता है।

भारत में ऐसे बहुत से लोग हैं जो होमवर्क में अपने बच्चों की मदद नहीं कर पाते। डॉक्टर का पर्चा नहीं पढ़ पाते। सरकारी योजनाओं की जानकारी नहीं हासिल कर पाते। या फिर अखबारों में निकली नौकरियों के विज्ञापन नहीं देख पाते। ऐसे लोग स्कूल के अलावा कहीं और जाकर पढ़ सकें, इसकी सख्त जरूरत महसूस की जा रही है। ऐसे लोगों की मदद प्लैनेटरीड नाम की स्वयंसेवी संस्था कर रही है। ये संस्था सेम लैंग्वेज सबटाइटलिंग (SLS) के जरिए टीवी देखने वाले लोगों को साक्षर बना रही है।
 

सेम लैंग्वेज सबटाइटलिंग क्या है?

SLS के तहत टीवी स्क्रीन पर उस कार्यक्रम के बोल स्थानीय भाषा में लिखकर आते हैं, जो उस वक्त चल रहा होता है। यानी दर्शक, टीवी देखने के साथ पढ़ भी सकते हैं। कई मुश्किल शब्द लोग इसी तरह सीख जाते हैं। बार-बार वही शब्द देखते हुए दर्शकों को वो याद हो जाते हैं।

प्लैनेटरीड के संस्थापक बृज कोठारी कहते हैं कि लोग कोशिश कर के नहीं पढ़ते। बल्कि वो गाने और बोल के बीच तालमेल बिठाते हुए पढ़ने लगते हैं। इटली में हुए एक रिसर्च के मुताबिक टीवी स्क्रीन पर सबटाइटल लिखने से देखने वालों को समझने में आसानी होती है।

वहीं, प्लैनेटरीड का दावा है कि सबटाइटल की वजह से लोग खुद ब खुद पढ़ने की तरफ खिंचते हैं। अगर किसी कार्यक्रम के बोल स्क्रीन पर लिखे आते हैं, तो आम तौर पर लोग उसे पढ़ते ही हैं। ब्रिटेन की नॉटिंगम यूनिवर्सिटी के मुताबिक जो लोग SLS यानी सबटाइटल वाले कार्यक्रम देखते हैं, वो दूसरों के मुकाबले ज्यादा पढ़-लिख सकते हैं।

'साक्षरता अभियान से सस्ता विकल्प'

बृज कोठारी बताते हैं कि सबटाइटल वाले गाने देखने वालों के बीच अखबार पढ़ने वालों में 70 फीसद का इजाफा हुआ है। सबटाइटल वाले टीवी कार्यक्रम देखने वाले 3 से 5 साल में आसानी से पढ़ना सीख जाते हैं।

प्लैनेटरीड का कहना है कि ये किसी भी साक्षरता अभियान से सस्ता विकल्प है। 50 हफ्ते के टीवी कार्यक्रमों के सबटाइटल बनाने में सालाना सिर्फ 10 लाख डॉलर का खर्च आएगा। जो कि दूसरे अभियानों के खर्च से बहुत कम है। पर दिक्कत ये है कि न तो सरकार इस प्रस्ताव को लेकर गंभीर है, और न ही दूसरी स्वयंसेवी संस्थाओं ने इसे ज्यादा भाव दिया है।

वहीं टीवी चैनलों का मानना है कि इससे दर्शक का ध्यान भटकेगा। इसलिए वो सबटाइटल लगाने को तैयार नहीं। जबकि बृज कोठारी का दावा है कि 90 फीसद दर्शक किसी भी कार्यक्रम को सबटाइटल के साथ देखना पसंद करेंगे।

कुछ निजी चैनल पैसे के एवज में SLS करने को तैयार हैं। क्योंकि वो इसे कॉपीराइट का मामला मानते हैं। कुछ लोग ये भी कहते हैं कि गाने के बोल बड़ी तेजी से स्क्रीन से गुजर जाते हैं। इससे इन्हें पढ़ने में दिक्कत होती है। लेकिन बृज कोठारी कहते हैं कि लोग मजे लेकर सबटाइटल पढ़ते हैं।
 
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मिल गई सैद्धांतिक मंजूरी

प्लैनेटरीड ने प्रोजेक्ट DRUV के तहत साक्षरता का साझा अभियान चलाया हुआ है। इस प्रोजेक्ट के तहत लोगों को वेब कंटेंट सबटाइटल के साथ मुहैया कराया जा रहा है। इसे टीवी पर भी दिखाया जा सकता है। फिलहाल ये कार्यक्रम राजस्थान के करीब पांच हजार घरों तक पहुंचाया जा रहा है।

बृज कोठारी की संस्था को USAID, विश्व बैंक और अमरीकी लाइब्रेरी ऑफ कांग्रेस से काफी मदद मिल रही है। इससे वो करीब दो करोड़ दर्शकों तक सबटाइटल वाले कार्यक्रम पहुंचा पा रहे हैं।

अच्छी बात ये है कि इस साल जुलाई में भारत सरकार ने भी कोठारी के प्रस्ताव को सैद्धांतिक तौर पर ही सही, मंजूरी दे दी है। साथ ही कोठारी ने कहा है कि सरकार ऐसा कानून बनाए कि तमाम प्रसारण कंपनियां अपनी कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी CSR के तहत कमाई का एक फीसद हिस्सा SLS यानी कार्यक्रमों की सबटाइटलिंग में खर्च करें।
तब टीवी देखते-देखते पढ़ना-लिखना सीख जाएगा इंडिया!
 
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