सन 1931 में गुजरात के वलसाड़ में एक मध्यवर्गीय परिवार में जन्मी निरूपा राय की गिनती बॉलीवुड के सबसे संजीदा कलाकारों में होती है। हालांकि उनकी पढ़ाई चौथी कक्षा तक ही हो पाई थी। 15 साल की उम्र में उनकी शादी मुंबई के राशनिंग विभाग के कर्मचारी कमल राय से हुई। कमल राय फिल्मों के बहुत शौकीन थे। उन दिनों फिल्मों में अभिनय को लेकर एक विज्ञापन पर उनकी नजर पड़ी।
वीएम व्याज ने रनकदेवी के लिए कलाकारों को आमंत्रित किया था। कमल भी अपना भाग्य आजमाने गए। साथ में उनकी पत्नी निरूपा भी थी। वहां व्यास से मिले। कुछ देर में वीएम व्यास ने उनसे कहा, तुम अभिनेता बनने के लालक नहीं।
लेकिन अगर तुम चाहो तो तुम्हारी पत्नी को रोल दिया जा सकता है। चार सौ रुपए में निरूपा को उस फिल्म में काम मिल गया। हालांकि कुछ समय बाद उन्होंने इस फिल्म को छोड़ दिया। लेकिन फिल्म कला की ओर उनका रुझान हो गया।
मां से पहले फिल्मों की देवी
निरूपा ने फिल्म में अपनी शुरूआत 1946 में आई गुजराती फिल्म गणसुंदरी से की। लेकिन 'हमारी मंजिल' उनकी पहली हिंदी फिल्म थी। इसके बाद वह फिल्म गरीबी में जयराज के साथ दिखीं।
1951 में हर हर महादेव में उनके पार्वती की भूमिका को लोगों ने बहुत सराहा। और इसके तुरंत बाद जब वह वीर भीमसेन में द्रोपदी के किरदार में आईं तो दर्शक उनके अभिनय पर मुग्ध हो गए। उन्होंने फिल्म में देवियों के किरदार के रूप में पहचान बन गई।
तलवार चलाने वाली निरूपा
'सिंदबाद दी सेलर' में उन्हें ऐसी युवती का रोल मिला जो तलवार चलाती है और मारधाड़ करती है। 1951 में आई इस फिल्म में यह नकारात्मक भूमिका थी।
निरूपा को इस रोल में देख कर दर्शक भड़क गए। उन्होंने इससे पहले निरूपा को फिल्म में देवियों का रोल करते हुए देखा था। अचानक उनका यह बदला स्वरूप देखकर वह विचलित हो गए। उनका कहना था कि देवी कैसे इस तरह तलवार चला सकती है। मारधाड़ कर सकती है।
पचास और साठ के दशक में निरूपा ज्यादातर धार्मिक फिल्मों में ही आई। निरूपा ने दर्शकों की भावना को समझा। इसके बाद वह कभी इस तरह के रोल में नजर नहीं आई।
दो बीघा जमीन से मिली पहचान
बिमल राय की दो बीघा जमीन निरूपा राय के लिए मील का पत्थर साबित हुई। निरूपा राय का सरल सहज अभिनय लोगों को पसंद आया। उनका स्वाभाविक अभिनय सिने दर्शकों को पसंद आया। खासकर उनकी संवाद शैली गजब की थी।
उनका अभिनय इतना सहज था कि उनका किरदार लोगों के दिलो दिमाग में उतर जाता था। दो बीघा जमीन में उनके अभिनय को खासा सराहा गया। यह फिल्म जगत की उत्कृष्ट फिल्मों में से एक है। इस फिल्म में वह किसान की पत्नी बनी हैं।
देवानंद की मां
देवानंद उनसे उम्र में बड़े थे। लेकिन फिल्म मुनीमजी में वह देवानंद की मां बनीं। 1955 में आई इस फिल्म में फिल्म में अपने सशक्त अभिनय के लिए वे सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के फिल्म फेयर पुरस्कार से सम्मानित की गईं, लेकिन इसके बाद छ: वर्षों तक उन्होंने मां की भूमिका स्वीकार नहीं की। फिल्मीस्तान की इस फिल्म में उनका अभिनय लाजवाब था।
फिल्म 'छाया' में उन्होंने एक बार फिर मां की भूमिका निभाई। इसमें वे आशा पारेख की मां बनीं। फिल्म में भी उनके जबरदस्त अभिनय को देखते हुए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी पहचान मां के किरदार के तौर पर होने लगी।
मेरे पास मां है
1975 में प्रदर्शित फिल्म 'दीवार' निरूपा राय के करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों में शुमार की जाती है। दीवार फिल्म कई कोणों से भारतीय सिने दर्शकों को प्रभावित करती है।
इस फिल्म का एक संवाद सबकी जुबान पर चढा। यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में उन्होंने शशि कपूर और अमिताभ बच्चन के मां की भूमिका निभाई।
इस फिल्म में सलीम जावेद का संवाद था, जिसमें एक किरदार अमिताभ अपने भाई शशि कपूर से कहता है, मेरे पास बंगला है गाड़ी है पैसा है तुम्हारे पास क्या है। शशि कपूर का जवाब होता है, मेरे पास मां है।
भले अमिताभ और शशि कपूर के बीच यह संवाद हुए हो। लेकिन दर्शकों के मन में निरूपा राय की मां की छवि सामने आई। उन्होंने इस किरदार को जीवंत कर दिया।
एक मां का स्वरूप जिसे वह पिछले दो दशक से पर्दे पर साकार होते देख रहे थे। लगा कि इस संवाद में ही उनके फिल्मों के योगदान के प्रति सम्मान भी दिया गया। मां का स्वरूप निरूपा के साथ जुड़ा।
अमिताभ की मां के रूप में भूमिका अत्यंत प्रभावशाली
निरूपा राय के सिने करियर पर नजर डालने पर पता चलता है कि सुपरस्टार अमिताभ बच्चन की मां के रूप में उनकी भूमिका अत्यंत प्रभावशाली रही है। उन्होंने सर्वप्रथम फिल्म 'दीवार' में अमिताभ बच्चन की मां की भूमिका निभाई।
इसके बाद खून पसीना, मुकद्दर का सिकंदर, अमर अकबर एंथोनी, सुहाग, इंकलाब, गिरफ्तार, मर्द और गंगा-जमुना सरस्वती जैसी फिल्मों में भी वे अमिताभ बच्चन की मां की भूमिका मे दिखाई दीं।
पगली का अभिनय करना चाहती थीं निरूपा
निरूपा राय किसी फिल्म में पगली का अभिनय करना चाहती थी। लेकिन उन्हें कभी यह मौका नहीं मिला। कोई ऐसी फिल्म नहीं आई जिसमें वह इस किरदार को निभा सके।
नब्बे के दशक के आखिरी दिनों में 'लाल बादशाह' में वे अंतिम बार अमिताभ बच्चन की मां की भूमिका मे दिखाई दीं।
अपने पांच दशक लंबे सिने करियर में लगभग 300 फिल्मों में अभिनय किया। अपने दमदार अभिनय से दर्शकों को मंत्रमुगध करने वाली निरूपा राय 13 अक्टूबर 2004 को इस दुनिया को अलविदा कह गईं।