कारगिल, एक ऐसा शब्द है, जो हर भारतीय के खून में गर्माहट ला देता है। 17 साल हो गए कारगिल की जंग को लेकिन आज भी उसकी यादें हर भारतीय के जहन में जिंदा है। भला फिर वो लोग जिन्होंने इस जंग में अपने परिवार के लोगों को खोया वो इस जंग को कैसे भुला सकते हैं। जो सैनिक शहीद हुए उनके परिवार को तो लाश देखकर सब्र आ गया लेकिन जो देश की रक्षा के लिए गए और फिर ना खुद कभी लौट कर आए और ना उनकी कोई खबर आई, उनका क्या? कारगिल की जंग में गुम हुए सैनिक की बीवी खुद को विधवा कहे या सुहागन? ऐसा ही हुआ है दो परिवारों के साथ, ये परिवार हैं सरताज सिंह और इमान खान के। इमान और सरताज, दोनों ही कारगिल की जंग में गायब हो गए।
सरताज और इमान की कहानी को छोटे पर्दे पर लेकर आ रहे हैं निखिल अडवाणी। 'पी ओ डब्ल्यू-बंदी युद्ध के' नाम की ये टीवी सीरीज पांच महीने तक चलेगी। 'कभी अलविदा ना कहना', 'डी डे' और 'कट्टी-बट्टी' जैसी फिल्मों के निर्देशक अपनी इस टीवी सीरीज को लेकर बेहद उत्साह में हैं। उन्होंने अपने इस प्रोजेक्ट को लेकर अमर उजाला से लंबी बातचीत की है।
फिल्म ना बनाकर आप टीवी की तरफ क्यों आए?
देखिए, 'पी ओ डब्ल्यू-बंदी युद्ध के' की जो कहानी है, उसे दो घंटे बीस मिनट में समेटना मुश्किल था। मुझे लगा कि मैं इस कहानी को इतने कम वक्त में नहीं कह सकता तो फिर टीवी पर आने फैसला लिया। जिसका नतीजा ये सीरीज है।
टीवी पर अतिनाटकीयता परोसी जाती रही है, आपकी सीरीज का विषय हकीकत के करीब है। ऐसे में 'सास-बहू' फॉर्मेट से कैसे ये अलग होगा?
मैं इस सवाल पर एक बात साफ कर दूं, कि टीवी पर क्या होता रहा है इसका कोई मतलब नहीं है। आप भूल जाइए कि अब तक आपने क्या देखा। मैं टीवी के कल्चर को इस सीरीज से बदल दूंगा।
मेरठ में आरिफ नाम के सिपाही कारगिल युद्ध के दौरान बंदी बनाए गए। जब छह साल बाद वो लौटे तो बीवी का निकाह किसी और से हो चुका था। आपकी कहानी भी कुछ ऐसी लगती है?
नहीं, मेरे जानकारी में ऐसा कुछ भी नहीं था। अगर मेरठ में भी इस तरह का मामला रहा तो ये इत्तेफाक है। देखिए, इस तरह के मामले मेरठ ही नहीं दुनियाभर में मिलेंगे। क्योंकि युद्ध में सैनिकों को बंदी बनाया जाना और फिर उनके परिवार पर टूटने वाला कहर तो हर जगह एक जैसा है, वो दुनिया का कोई शहर कोई देश हो।
इस सीरीज की कहानी के बारे में कुछ बताइए?
ये अयान और सरताज के परिवार की कहानी है। जो कारगिल की जंग में युद्धबंदी बना लिए गए। ये सिर्फ कारगिल की कहानी नहीं है। ये 17 साल की कहानी है। एक तरफ ये दो सैनिक पाकिस्तान में बंदी हैं और दूसरी तरफ परिवार में क्या हो रहा है। वो बीवी जिसकी कोख में सैनिक बच्चा छोड़ गया, अब वो जवान हो गया है। अयान वापस आया है लेकिन उसकी बीवी उसके भाई के करीब आ चुकी है। ये युद्ध की नहीं बल्कि जज्बात की कहानी है। बेटे की याद में मां के आंखों से गिरते आंसूओं की कहानी है, 17 साल तक पति के जिंदा होने और वापस लौट आने की आस लगाए पत्नी की कहानी है। ये सीरीज पांच महीने चलेगी।
जो दो किरदार आपने चुने हैं, वो दोनों भारत के अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। इसकी कोई खास वजह?
बढ़ी हुई दाढ़ी को खुजलाते हुए निखिल कहते हैं, आपका सवाल बहुत सही है। कोई खास वजह तो नहीं लेकिन हां एक कोशिश जरूर है।
क्या ये अल्पसंख्यकों की देशभक्ति पर सवाल उठाने वालों को जवाब देने की कोशिश है?
मुझे बड़ा बुरा लगता है जब किसी को नाम की वजह से उसको आतंकी कहा जाए और आप ठीक कह रहे हैं। दोनों मुख्य किरदारों के अल्पसंख्यक होने की वजह एक मैसेज देना है।
तो क्या सीरीज अल्पसंख्यकों को लेकर कोई खास संदेश देती है?
ऐसा नहीं है, मैंने इंडिया को लेकर ये सीरीज बनाई है। मेरा हीरो अयान इंडिया से है, इसलिए कैद होता है। हां 17 साल लौटने के बाद जिस तरह से उनके 17 साल पाक में गुजारने को लेकर उनसे आला आधिकारी सवाल करते हैं, उसमें काफी कुछ बताने की कोशिश की गई है।
आपके निर्देशन में पहली फिल्म 'कल हो ना हो' बड़ी हिट हुई लेकिन इसके बाद वो सफलता नहीं मिल पाई। क्या वजहें रहीं?
मैंने आंख बंद करके कुछ नहीं किया लेकिन सारी चीजें आपकी मुताबिक नहीं होती। हर फिल्म का रिजल्ट आपके मुताबिक नहीं रह सकता। कट्टी-बट्टी मुझे पसंद है लेकिन फिल्म नहीं चली। 'चांदनी चौक टू चाइना' का क्या हाल होने वाला है, मुझे पहले ही पता था।
शाहरुख के साथ पहली फिल्म की, लेकिन इसके बाद कभी साथ नहीं आए?
'कल हो ना हो' शाहरुख और मेरे, दोनों के लिए बहुत बड़ी फिल्म साबित हुई। ये बेहद शानदार फिल्म है। मुझे शाहरुख के लिए कोई वैसी ही स्क्रिप्ट मिले तभी तो उनके साथ काम करूं। मैं शाहरुख के साथ 'चक दे इंडिया' और 'स्वदेश' जैसी फिल्म बनाना चाहता हूं।