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नेशनल अवार्ड विजेता फिल्मों के पीछे छिपी है हैरतअंगेज सच्चाई, कह उठेंगे आप 'मुट्ठी में सिनेमा'

Sun, 27 May 2018 04:18 PM IST
विनोद अनुपम, सुपरिचित फिल्म समीक्षक
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Village Rockstars
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कुछ वर्ष पहले राम गोपाल वर्मा ने अपनी एक फीचर फिल्म का बड़ा हिस्सा मोबाइल कैमरे से शूट कर यह स्थापित कर दिया था कि सिनेमा की तकनीक बदल रही है। अवॉर्ड पाने वाली असमिया फिल्म ‘विलेज रॉकस्टार’ को फिल्म की शूटिंग में आमतौर पर काम आने वाले पारंपरिक कैमरे के स्थान पर रेड और डिजिटल हैंडहेल्ड कैमरे से शूट किया गया था। 

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65वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का पुरस्कार पाने वाली असमिया फिल्म ‘विलेज रॉकस्टार्स’ को फिल्म की शूटिंग में आमतौर पर काम आने वाले पारंपरिक कैमरे के स्थान पर रेड और डिजिटल हैंडहेल्ड कैमरे से शूट किया गया था। कमाल यह कि न तो कैमरे के पीछे खड़ी निर्देशक रीमा दास निर्देशन, सिनेमेटोग्राफी या एडिटिंग में प्रोफेशनल थी, न ही फिल्म के कोई अभिनेता प्रोफेशनल हैं। लड़की रीमा दास एक सपना देखती है और गांव वालों के साथ मिलकर उसे साकार कर लेती है।

साथ में होती है, सिर्फ उसकी जिद और नई तकनीक। यह फिल्म असम के एक छोटे से गांव ‘कलारदिया’ में हैंडहेल्ड कैमरे से बनाई गई है। फिल्म में गांव के ही लोगों ने अभिनय किया है। उल्लेखनीय है कि इसी फिल्म के लिए वनिता दास को ‘सर्वश्रेष्ठ बाल अभिनेता’ के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। निर्देशक रीमा दास ने इंटरनेट पर देख-देखकर फिल्में बनाना सीखा, एडिटिंग सीखी और अपनी फिल्म के लिए ‘सर्वश्रेष्ठ संपादन’ का पुरस्कार भी हासिल किया। 

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कुछ वर्ष पहले राम गोपाल वर्मा ने अपनी एक फीचर फिल्म का बड़ा हिस्सा मोबाइल कैमरे से शूट कर यह स्थापित कर दिया था कि सिनेमा की तकनीक बदल रही है। हिंदी सिनेमा में आए हालिया बदलाव ने अभिनय के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि तकनीक के क्षेत्र में भी पुराने वर्चस्व को तोड़ते हुए नए के लिए जगह बनाई। 

जब कोई फिल्मकार धुर असम के एक गांव के बच्चों की कहानी ‘विलेज रॉकस्टार्स’ परिकल्पित करता है, तो तय रूप से वहां ‘पद्मावत’ जैसी फिनिशिंग की अनिवार्यता नहीं रह जाती, बल्कि वह अव्यावहारिक भी लग सकती है। हालांकि यह परंपरा नई नहीं, फिल्मकारों ने जब भी कोई बात नई शैली में कहनी चाही, नई तकनीक उनकी मददगार बनी। सबसे बड़ी बात इस नई तकनीक के सस्ते होने से नए कहने के जोखिम को भी लगभग समाप्त कर दिया।

कुछ वर्ष पहले किरण राव ने जब मुंबई के आम जनजीवन का डॉक्यूमेंटेशन ‘धोबी घाट’ के रूप में प्रस्तुत करने की सोची थी, तो शूटिंग के लिए उनकी पसंद सुपर ’16 कैमरा’ बना, जो आमतौर पर डॉक्यूमेंट्रियों की शूटिंग के लिए ही उपयोग में लाया जाता है। यहां तक कि कुछ भीड़भाड़ की शूटिंग उन्होंने मिनी डीवी कैमकॉर्डर से भी पूरी की। वास्तव में, सिनेमा को अब ऐसे कैमरामैन की तलाश रहती है, जिसे स्विट्जरलैंड की वादियों और आल्प्स की पहाड़ियों के बजाय आम भारत की समझ हो, जो यहां के आम जनजीवन में सौंदर्य ढूंढ सकता हो। मलयालम फिल्म ‘भयानकम’ के लिए चारों तरफ पानी से घिरे घनघोर बारिश के बीच की शूटिंग निखिल एस प्रवीण ही कर सकते थे, जिन्हें सर्वश्रेष्ठ सिनेमेटोग्राफर के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया।

तकनीशियनों की इस नई पीढ़ी के सामने गाने और नृत्य शूट करने के बजाय जीवन शूट करने की जवाबदेही थी। आज कई फिल्मों के बड़े-बड़े हिस्से वीडियो रिकॉर्डिंग की सुविधा वाले ‘कैनन स्टिल कैमरे’ से की जा रही है। वास्तव में, जैसे-जैसे सिनेमा में कहानियों का दायरा विकसित होता जाएगा, नई तकनीक की भी जरूरत पड़ेगी। आज यदि लक्षद्वीप की लुप्तप्राय भाषा जसारी में या लद्दाखी में कोई फीचर फिल्म बनाने की हिम्मत जुटाता है, तो उसका श्रेय निश्चित रूप से फिल्मकार की जिद के साथ तकनीक के आम हाथों में सहज रूप से आने और सस्ते होने को भी दिया जाना चाहिए। आश्चर्य नहीं कि आज मोबाइल फोन पर बनी फिल्मों की कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं आयोजित हो रही हैं। मतलब हरेक आदमी जिसके हाथों में एक स्मार्टफोन है, उसके फिल्मकार बनने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

‘सिंजर’ को जसारी भाषा में बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार के साथ इसके निर्देशक पंपल्ली को सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक के ‘इंदिरा गांधी पुरस्कार’ से भी सम्मानित किया गया। वास्तव में, ‘सिंजर’ भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक बड़ी घटना के रूप में स्वीकार की जा सकती है। लक्षद्वीप के एक छोटे से समुदाय के बीच बोली जाने वाली जसारी भाषा, जिसके पास न तो अपनी लिपी है, न ही सिंटैक्स। मलयालम, तुलु, कन्नड़ और अरबी के मेल से बनी यह भाषा आज भी अपने अध्ययन के लिए भाषाविज्ञानियों की प्रतीक्षा कर रही है। जाहिर है ऐसे में जबकि संविधान की आठवीं अनुसूची में भी यह दर्ज नहीं, फीचर फिल्म बनाने की जोखिम का अंदाजा लगाया जा सकता है। एडिटिंग और साउंड रिकॉर्डिंग में भी अब स्टूडियो के मंहगे खर्चे को लैपटाप ने काफी कम कर दिया है। अब पूरी शूटिंग पेनड्राइव में एडिटर को दे दी जाती है। एडिटर अपने ड्रॉइंगरूम में लैपटाप पर एडिट कर फिल्म तैयार कर लेता है। आश्चर्य नहीं कि इस वर्ष लद्दाखी फिल्म ‘वॉकिंग विद द विंड’ को साउंड डिजाइनिंग और साउंड मिक्सिंग के दो-दो राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
 
लद्दाखी में जहां सिनेमा देखने की भी कायदे की सुविधा नहीं, प्रवीण मोरछले अपनी मातृभाषा में फिल्म बनाने को तैयार होते हैं। उन्होंने कोई नई कहानी नहीं कही, लेकिन पहली बार लद्दाख के लोगों के जीवन का संघर्ष, उनका दर्द, उनकी भावनाएं परदे पर दिखीं, तो सब विस्मित हो गए। फिल्म में एक जापानी पर्यटक को मोबाइल नेटवर्क की जरूरत होती है। गांव की एक बच्ची उसे पहाड़ी की चोटी पर ले जाती है। वह पूछती है, ‘तुम लोगों को मोबाइल की जरूरत होती है, तो क्या करती हो?’ बच्ची भोलेपन से जवाब देती है, ‘जरूरत ही नहीं पड़ती, हमारा पूरा परिवार यहीं रहता है। वास्तव में तकनीक की सहूलियत से ही संभव हो रहा कि अपनी जमीन से जुड़ी अपनी कहानियां लेकर बेहिचक लोग आगे आ रहे हैं।
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कहानी भले ही छोटी हो, मगर...
वास्तव में ये ऐसी फिल्में हैं, जो बाजार के दबाव से परे हैं, ये कला फिल्म होने के दावे से भी परे हैं। इनके पास बस कहानी है, जिसे रोचक अंदाज में ये कह जाते हैं। इन्हें हिट या फ्लॉप की परवाह नहीं होती, क्योंकि अपनी फिल्म की छोटी-सी लागत निकालने में इन्हें परेशानी नहीं होती। मराठी में बनी ‘धप्पा’ को राष्ट्रीय एकता पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म के लिए नरगिस दत्त अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है।

खास बात यह है कि धप्पा के निर्देशक निपुण धर्माधिकारी थिएटर के जाने-माने नाम हैं। फोर्ब्स ने उन्हें थिएटर के रिवाइवल के लिए खासतौर पर रेखांकित किया है। वे 19 नॉन-एक्टर बच्चों के साथ धप्पा बनाने का जोखिम उठाते हैं और सफल होते हैं। इनके पास फिल्म को सजाने के लिए करोड़ों नहीं हैं, करोड़ों की कहानियां हैं। ऐसे में डिजिटल क्रांति इनके लिए उत्प्रेरक का काम करती है। आंकड़ों के अनुसार, हाल ही में आई हॉलीवुड फिल्म ‘एवेंजर्स द इनफिनिटी वॉर’ के विश्वभर में सिर्फ प्रमोशन का बजट 975 करोड़ रुपये था, जिसमें इस वर्ष राष्ट्रीय पुरस्कार पाने वाली सभी यानी लगभग 100 फिल्में आसानी से बनाई जा सकती हैं।

आश्चर्य नहीं कि हिंदी में एवेंजर्स बनाने की बात पर अनुराग कश्यप हंसकर कहते हैं, “सोच भी नहीं सकते।” संतोष कर सकते हैं कि हजार करोड़ के आकर्षण से परे नई तकनीक के सार्थक प्रयोग से हम आज कान्स फिल्म समारोह में वैश्विक फिल्मों से मुकाबला कर रहे हैं। जरूरत है अब नई कहानियों के साथ आ रही विभिन्न भाषायी फिल्मों के स्वीकार्यता की।
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