भाई की तरह चुनी अभिनय की राह
पहली पाकिस्तानी फिल्म में आए नजर
नासिर खान ने 1945 में फिल्म 'मजदूर' से अपने अभिनय की शुरुआत की। उनकी सादगी और गहराई ने दर्शकों का ध्यान खींचा, लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही लिखा था। 1947 का बंटवारा न केवल देश को, बल्कि लाखों जिंदगियों को दो हिस्सों में बांट गया। नासिर खान लाहौर पहुंचे, जहां उन्होंने 1948 में पहली पाकिस्तानी फिल्म 'तेरी याद' में अभिनय किया। यह फिल्म इतिहास के पन्नों में दर्ज है, क्योंकि यह पाकिस्तान की पहली सिनेमाई पेशकश थी। इसके बाद 1949 में 'शाहिदा' में भी उन्होंने अपनी कला दिखाई। हालांकि, ये दोनों फिल्में दर्शकों का दिल जीतने में नाकाम रहीं। शायद यह नाकामी ही थी या फिर मातृभूमि की पुकार जो नासिर को 1951 में वापस भारत खींच लाई।
भारत लौटकर यूं संवारा करियर
बॉम्बे (मुंबई ) लौटकर नासिर ने अपने करियर को नई उड़ान दी। 1951 में आई फिल्म 'नगीना' उनकी जिंदगी का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। नूतन के साथ उनकी जोड़ी ने स्क्रीन पर जादू बिखेरा। इस थ्रिलर ड्रामा में नासिर की संजीदगी और नूतन की मासूमियत ने दर्शकों को बांधे रखा। नगीना की सफलता के बाद दोनों की जोड़ी 'आगोश' और 'शीशम' में भी लोगों का दिल जीतने में कामयाब रही। नासिर की खासियत उनकी सादगी थी जो हर किरदार में गहराई लाती थी। उनकी जिंदगी एक और यादगार लम्हा तब आया जब उन्होंने अपने भाई दिलीप कुमार के साथ साल 1961 की फिल्म 'गंगा जमुना' में काम किया। इस फिल्म में दोनों भाइयों की जोड़ी ने सिल्वर स्क्रीन पर भावनाओं का तूफान ला दिया। नासिर का किरदार छोटा था, लेकिन उनकी मौजूदगी ने कहानी को और गहरा बनाया।
असल जीवन में दो बार की शादी
नासिर खान का निजी जीवन की बात करें तो उनकी पहली शादी मशहूर फिल्म निर्माता नजीर अहमद खान की बेटी सुरैया नजीर से हुई थी। इस शादी से उनकी बेटी नाहिद खान का जन्म हुआ। बाद में, उन्होंने अभिनेत्री बेगम पारा से विवाह किया, जिनसे उनके बेटे अयूब खान ने जन्म लिया। आगे चलकर अयूब खान ने भी अभिनय की दुनिया में कदम रखा।
निधन के बाद रिलीज हुई आखिरी फिल्म
1970 के दशक में नासिर ने एक बार फिर सिनेमा की दुनिया में कदम रखा। यादों की बारात (1973) में उनकी छोटी-सी भूमिका ने भी दर्शकों का ध्यान खींचा। उनकी आखिरी फिल्म बैराग (1976) उनकी मृत्यु के बाद रिलीज हुई, जिसमें उन्होंने अपने भाई दिलीप कुमार के साथ फिर से स्क्रीन साझा किया था। 3 मई 1974 को महज 50 साल की उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। नासिर के निधन को भले ही पांच दशक हो चुके हों, लेकिन उनकी कला, उनकी सादगी, और उनकी कहानियां आज भी सिनेमा के गलियारों में गूंजती हैं।