मुनव्वर राणा इस समय के रिश्तों के सबसे बड़े शायर हैं। उनकी शायरी में रिश्तों की जो महक दिखती है वह दुर्लभ है। और जब बात मां की आ जाए तो मुनव्वर की भावनाएं कुछ इस तरह छलकती हैं कि किसी सुनने वाले की भी आंखें नम हो जाएं।
मंगलवार, नौ फ़रवरी को मुनव्वर राणा की माता जी का निधन हो गया। जिस मां की मोहब्बत और हिफ़ाज़त ने मुनव्वर से रिश्तों की इतनी भावुक कर देने वाली शायरी करवाई उस मां को श्रद्धांजलि के रूप में हम उनकी पांच चुनिंदा ग़ज़लें अपने पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहे हैं।
ये सभी ग़ज़लें उनके संग्रह 'मां' से ली हुई हैं. इस संग्रह के प्रकाशन के साथ मुनव्वर राणा ने घोषणा की थी कि इस किताब की सारी आमदनी 'मां फाउंडेशन' की ओर से ज़रूरतमंदों के लिए खर्च कर दी जाएगी। इन ग़ज़लों के लिए कविता कोश का भी आभार।
गले मिलने को आपस में दुआयें रोज़ आती हैं
अभी मस्जिद के दरवाज़े पे माएँ रोज़ आती हैं
कभी —कभी मुझे यूँ भी अज़ाँ बुलाती है
शरीर बच्चे को जिस तरह माँ बुलाती है
किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई
ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ
माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ
मेरा खुलूस तो पूरब के गाँव जैसा है
सुलूक दुनिया का सौतेली माओं जैसा है
रौशनी देती हुई सब लालटेनें बुझ गईं
ख़त नहीं आया जो बेटों का तो माएँ बुझ गईं
वो मैला—सा बोसीदा—सा आँचल नहीं देखा
बरसों हुए हमने कोई पीपल नहीं देखा
कई बातें मुहब्बत सबको बुनियादी बताती है
जो परदादी बताती थी वही दादी बताती है