-निर्माताः टी-सीरीज/विशेष फिल्म्स
-निर्देशकः विक्रम भट्ट
-सितारेः गौरव अरोरा, इमरान हाशमी, कृति खरबंदा
रेटिंग **
दुकान खोलने से भले ही मुनाफा आता हो मगर इसका खतरा भी है। दुकान अपनी जमीन छोड़ कर आगे नहीं बढ़ने देती। विक्रम भट्ट इसके उदाहरण हैं। उन्होंने हॉरर की जमीन को सदी के शुरुआती दिनों से ऐसे पकड़ रखा है कि बस चिपक गए हैं। अन्य सिनेमाई भुतहा प्रयोग करते हुए वह राज सीरीज की चौथी कड़ी, राज रीबूट लाए हैं।
सिनेमा की जमीन तब उर्वर रहती है जब रचनात्मकता सींचती रहे। विक्रम यह कर पाते तो आज अपनी दुकान को शायद शो रूम में बदल देते। मगर नहीं कर सके। 'राज रीबूट' में आप इसके कारण देख सकते हैं।
क्यों ग्लोबल से लोकल की ओर जा रही 'राज रीबूट' ?
राज रीबूट
जब चीजें लोकल से ग्लोबल हो रही हैं, विक्रम ग्लोबल को लोकल बना देते हैं। आप चकित रह जाते हैं कि मुंबई जैसे महानगर से रोमानिया जाने वाले युवा नवविवाहित जोड़े की दुनिया घर से बाहर कहीं नहीं दिखती। घर में प्रेत बाधा का संकट पैदा होने के बाद नायक-नायिका जुदा राहों पर बढ़ते हुए विदेशी तंत्र-मंत्र विशेषज्ञों की मदद लेते हैं। ...और अंत में भूत से निपटने में काम आते हैं गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत और मंगलसूत्र!!
विक्रम भट्ट की कहानियों में भूत-प्रेत, काले जादू के विरुद्ध पुराण इत्यादी में दर्ज मंत्र शक्ति या तंत्र ही काम आते हैं। इस बार उन्होंने मंगलसूत्र की महिमा स्थापित की। नायिका के गले में मंगलसूत्र देख कर ‘किस’ करने के इरादे से आगे बढ़ रहा प्रेत मुंह फेर कर चल देता है।
फिल्म बताती है कि प्यार में ‘सीक्रेट’ रिश्ते की सेहत के लिए सही नहीं होते। नायिका (कृति खबरंदा) के पति (गौरव अरोरा) ने उससे एक बात छुपा रखी है। इसी की वजह से नायिका को भूत दिखने लगता है। जिसे उसका पति शुरुआत में वहम वगैरह कह कर खारिज करता है। परंतु जब उसकी आंखें खुलती है तो कहता है, ‘पागल वो नहीं होते जिन्हें भूत दिखते हैं। पागल वो होत हैं जिन्हें इंसान नहीं दिखते।’ फिल्म में दर्शक को दोनों दिखते हैं!
राज रीबूट में नया क्या है ?
राज रीबूट
राज रीबूट में ऐसा कुछ नहीं जो पुरानी फिल्मों में, टीवी पर आने वाले भुतहा धारावाहिकों में नहीं देखा हो। डराने वाले तत्व या दृश्य भी ऐसे नहीं हैं कि आप बाजू वाले की बांह थामने को मजबूर हो जाएं। गौरव अरोरा और कृति खरबंदा नए हैं। उन्हें आगे मौके मिल सकते हैं। परंतु सवाल यह कि इन रास्तों से बढ़ते हुए इमरान हाशमी और कितने चल पाएंगे। उनके लिए गंभीरता से सोचने का वक्त है।
फिल्म के दो-एक गीत सुनने लायक हैं। मगर उनमें ठहराव से ज्यादा तात्कालिकता है। विक्रम भट्ट सिनेमा का तकनीकी पक्ष भले ही जानते हों पर तय है कि उन्हें दर्जनों फिल्में बनाने के बाद भी कहानी के बारे में अधिक नहीं पता। अब यह देखना रोचक होगा कि भविष्य में क्या टी-सीरीज और विशेष फिल्म्स मिल कर फिल्म निर्माण में कदम आगे बढ़ाएंगे।