फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आखिर बॉलीवुड में धर्म क्यों बना है नया धंधा!

विज्ञापन
विज्ञापन
बॉलीवुड में धर्म अब एक नया धंधा बन गया है। जिसको समय-समय पर भुनाया जा रहा है।आने वाले समय में धर्म के विषय पर कई फिल्में आप देखने के लिए तैयार रहिए।
विज्ञापन


जो समाज में होता है वही सिनेमा दिखाता है। इस बात को आप मानें या ना मानें मगर हाल के वर्षों में जिस तरह से धर्म से जुड़े आडंबर, अंधभक्ति और कथित धर्म गुरु सुर्खियों में रहे हैं, उसने बॉलीवुड नया विषय दिया है।

धार्मिक विमर्श समाज और राजनीति के केंद्र में हैं और सिनेमा भी इस बहस में पीछे नहीं है। यह बात अलग है कि ज्यादातर फिल्मी कोशिशें इस मुद्दे को कॉमर्शियल ढंग से भुनाने की हैं।
विज्ञापन


ओ माई गॉड और पीके जैसी फिल्मों की सफलता इसकी गवाह है। आने वाले दिनों में भी धर्म के विषय पर बनी फिल्में आपको देखने को मिलेंगी। धर्मिक मुद्दों को केंद्र में रख कर बन रही और बन चुकी कुछ फिल्मों पर एक नजर।

धर्म संकट भी दिखेगी पर्दे पर

नसीरूद्दीन शाह, परेश रावल और अनु कपूर जैसे ऐक्टरों की इस फिल्म को आप मल्टीस्टारर कह सकते हैं। निर्देशक फवाद खान की यह कॉमेडी 10 अप्रैल को सिनेमाघरों में लगेगी।

फिल्म एक ऐसे हिंदू व्यक्ति (परेश) के इर्द-गिर्द घूमती है जो अचानक तब संकटग्रस्त हो जाता है जब उसे पता चलता है कि वह पैशाइशी मुसलमान था, मगर हिंदू परिवार ने उसे गोद ले लिया था।

तब वह अपने असली पिता की खोज में लगता है। फिल्म में नसीर नील बाबा बने हैं जो अपना नील धर्म चलाते हैं। फिल्म में धर्म की आड़ में होने वाले धंधे पर व्यंग्य है। फिल्म अंततः इंसानियत को सबसे बड़े धर्म के रूप में स्थापित करती है।

ग्लोबल बाबा भी होगी धर्म पर आधारित

निर्देशक मनोज सिद्धेश्वर तिवारी की यह फिल्म धर्म और अपराध के गठजोड़ को सामने लाती है। यह ऐसे अपराधी की कहानी है जो राजनीतिक आकाओं द्वारा त्याग दिए जाने के बाद कानून से बचने के लिए धर्म की दुनिया में शरण लेता है।

बाबा बन जाता है। देखते-देखते अंधभक्ति के मारे लोगों की भीड़ उसके पीछे चल पड़ती है। दुनिया में उसका डंका बजने लगता है। होते-होते सत्ता का शीर्ष भी उससे डरने लगता है। मगर अंत में बाबा की पोल खुलती है।

चर्चा है कि इस धार्मिक-राजनीतिक थ्रिलर में बाबा रामदेव और आसाराम बापू से प्रेरित किरदार भी दिखेंगे। ग्लोबल बाबा में अभिमन्यु सिंह, पंकज त्रिपाठी, रवि किशन और संजय मिश्रा जैसे कलाकार हैं।

रिलीज को तैयार-दोजखः इन सर्च ऑफ हैवन

यूपी के रहने वाले 32 साल के जैगम इमाम की फिल्म इस महीने 20 तारीख को रिलीज हो रही है। पत्रकार से फिल्मकार बने जैगम ने करीब पांच साल पहले दोखज नाम से उपन्यास लिखा था और फिर उस पर खुद फिल्म बनाई।

दोजखः इन सर्च ऑफ हैवन में बनारस की पृष्ठभूमि है। यह एक मुस्लिम पिता-पुत्र के रिश्तों की कहानी है। जिसमें कट्टर पिता किशोरवय बेटे को अपनी तरह बनाने की कोशिश करता है, मगर बेटे की मित्रता पास के मंदिर के पुजारी से हो जाती है।

उसे पूजा का प्रसाद और रामलीला आकर्षित करते हैं। पिता नाराज होता है। तभी काल का पहिया घूमता है और रिश्तों की गरमाहट और संवेदना के सामने धर्म की कट्टरता पिछड़ जाती हैं।

जैगम इमाम कहते हैं कि उनकी फिल्म आम बॉलीवुड फिल्मों से बिल्कुल हट कर और ऑफबीट है। इसमें धर्म को भुनाने की कोई कोशिश नहीं है क्योंकि धर्म इंसान का होता है, कहानी का नहीं।

आते ही विवादों में आ गई थी एमएसजीः द मैसेंजर (2015)

सिनेमा के साथ धर्म की मिक्सिंग का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है कि एक धार्मिक संप्रदाय के नेता गुरमीत राम रहीम सिंह खुद फिल्म एमएसजीः द मैसेंजर में हीरो बन कर आए।

फिल्म का लेखन, निर्देशन और निर्माण उन्होंने किया। फिल्म आज युवाओं में नशे की समस्या को मुख्य रूप से संबोधित करती है और बाबा खुद खलनायकों को ऐक्शन दृश्यों में ठिकाने लगाते हैं।

फिल्म को लेकर विरोध भी खूब हुआ और यह सेंसर में भी अटकी। अपुष्ट सूत्र फिल्म का दो सौ करोड़ रुपये का बिजनेस बता रहे हैं, मगर टिकट खिड़की के जानकार इसे 10 करोड़ के आस-पास कह रहे हैं।

सिंघम रिटर्न्स में था ढोंगी बाबा

देश में धर्म के नाम पर हो रही घटनाओं के गहरे प्रभाव को यूं भी देखा जा सकता है कि सिंघम रिटर्न्स जैसी मुख्यधारा की मसाला फिल्म में भी खलनायक एक ढोंगी बाबा को दिखाया गया।

जो राजनीति के शीर्ष तक अपनी पहुंच के कारण बहुत ही शक्तिशाली और प्रभावी है। धर्म की आड़ में तमाम गलत काम करने वाले सत्यराज चंदर (अमोल गुप्ते) को बाजीराव सिंघम (अजय देवगन) ठिकाने लगाता है।

यहां भी धर्म के साथ राजनीति का गहरा गठजोड़ दिखाई पड़ता है। ऐसे में अपने आप ही दर्शक के मन में आवाज उठती है, अता माझी सटकली।

धर्म से ज्यादा बिकाऊ कुछ नही पीके ने किया साबित

बॉक्स ऑफिस इतिहास की सबसे कमाऊ फिल्म बन कर पीके ने साबित कर दिया कि धर्म से ज्यादा बिकाऊ कुछ नहीं। फिल्म ने देश-विदेश में 600 करोड़ रुपये से ज्यादा का बिजनेस किया है।

आमिर खान के नग्न पोस्टर वाले विवाद से चर्चा में आई इस फिल्म में निर्देशक राजकुमार हिरानी ने दूसरे ग्रह के एक प्राणी (एलियन) के माध्यम से धर्म के मठाधीशों पर चोट की।

उन्होंने बताया कि ईश्वर के अस्तित्व की बात करते हुए किस तरह से धर्म के ठेकेदार लोगों की अंधश्रद्धा का दोहन करते हैं। हालांकि कई लोगों ने फिल्म का यह कहते हुए विरोध किया कि इसमें मुख्यतः हिंदू धर्म को निशाने पर रखा गया, परंतु इसे देखने के लिए सबसे ज्यादा हिंदू ही पहुंचे।
-

ओ माई गॉड ने किया रास्ता दिखाने का काम

यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि इधर आ रहीं तमाम धर्म कथा केंद्रित फिल्मों को राह दिखाने काम परेश रावल और अक्षय कुमार स्टारर ओ माई गॉड की सफलता ने किया। इसने बीस करोड़ रुपये का व्यवसाय किया था।

ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती देने और हमेशा तर्क को ऊपर रखने वाले कांजी भाई (परेश) को दर्शकों ने खूब पसंद किया। निर्देशक उमेश शुक्ला ने फिल्म में संतुलन बनाए रखा।

उन्होंने ईश्वर को स्थापित तो किया मगर उसके नाम पर मठाधीशी करने वालों को नकार दिया। यही बात दर्शकों को सबसे ज्यादा पसंद आई। यह फिल्म एक गुजराती नाटक कांजी विरुद्ध कांजी पर आधारित थी।

देख्‍ा तमाशा देख्‍ा

धर्म के साथ राजनीति के गठजोड़ का समाज और व्यक्ति पर समय-समय पर प्रभाव दिखता है। निर्देशक फिरोज अब्बास खान की देख तमाशा देख में भी यह सामने आता है।

एक गरीब आदमी गबरू नेता के भारी-भरकम कट-आउट के नीचे दब कर मर जाता है और उस पर धर्म की राजनीति शुरू हो जाती है। पता चलता है कि मरने वाला पैदाइशी हिंदू था, मगर बाद में उसने इस्लाम को अपना लिया था।

एक गरीब की मौत दो धर्म के लोगों के बीच दंगों का सबब बन जाती है क्योंकि एक गुट उसे जलाना चाहता है और दूसरा दफनाना। यह फिल्म एक सच्ची घटना पर आधारित बताई जाती है।
विज्ञापन

नकली बाबा की कहानी थी चल गुरू हो जा शुरू

जनवरी में रिलीज हुई निर्देशक मनोज शर्मा की यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर नाकाम रही। चंद्रचूड़ सिंह, संजय मिश्रा और हेमंत पांडे जैसे ऐक्टरों की मौजूदगी में फिल्म को दर्शक नहीं मिले।

कमजोर स्क्रिप्ट, द्विअर्थी संवाद और बेसिरपैर की बातों वाली यह फिल्म शुरू होती है दो संघर्षरत अभिनेताओं के पैसे के लालच में नकली बाबा बनने से। धीरे-धीरे फिल्म में धन, सत्ता और तमाम तरह का भ्रष्टाचार सामने आता है।

आखिरकार झूठ लंबे टिक नहीं पाता और उसके पैर उखड़ जाते हैं। बहुत ही हल्के ढंग से बनाई गई फिल्म बताती है कि अच्छा कंटेंट हो तो ही दर्शक आते हैं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें