जंजीर फिल्म ने एक अध्याय खोला था। यहीं से अमिताभ को उंचाई मिली थी। लेकिन बात यहां जंजीर के उस गीत की हो रही है, जो अमिताभ पर तो नहीं फिल्माया गया था, लेकिन जंजीर के उस गीत ने खासी शोहरत बटोरी थी।
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यारी है ईमान मेरा यार मेरी जिंदगी... मन्नाडे के स्वरों में यह गीत हर जगह गूंज रहा था। कल्याणजी आनंदजी इस धारा के साथ खड़े हो गए। पर्दे पर प्राण पठान बन कर गा रहे थे और पार्श्व में मन्ना डे के स्वर थे।
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गीत संगीत की तैयारी ऐसी कि सचमुच पठानी माहौल सा बन गया। तब जाना कि रबाब बजाने वाले को भी काबुल से बुलाया गया था। मन्ना डे ने उससे कई तरह की जानकारी लेते रहे। वहां के मिजाज को समझते रहे।
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उन्होंने गीत का एक एक शब्द का सही उच्चारण समझने की कोशिश की थी। रबाब ढोल और तीन वायलेन के साथ सजा था यह गीत। मन्नाडे ने पूरे रंग में गाया।
कौन कह सकता था कि शास्त्रीय और उदासी के स्वरों के लिए जाने गए मन्ना दा इस तरह के गीत को भी इतनी बखूबी गवा सकते हैं। एक बार उन्होंने कहा कि हम एसडी बर्मन के संगीत के कायल थे।