जनता को कारण जरूर पता होना चाहिए
कामरा ने आगे लिखा कि यह फिल्म जसवंत सिंह खालरा की कहानी बताती है, जिन्होंने मानवाधिकारों के उल्लंघन को उजागर किया था और इसकी कीमत अपनी जान देकर चुकाई। उन्होंने कहा कि अगर सच्ची घटनाओं पर बनी फिल्म को लोग देख ही नहीं सकते, तो जनता को इसका कारण जरूर पता होना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि इससे फिल्ममेकर्स को एक साफ संदेश जाता है कि अगर वे किसी खास समुदाय के महान व्यक्ति की कहानी दिखाएंगे, तो उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।
सेंसर बोर्ड पर लगाए गंभीर आरोप
कुणाल कामरा ने सेंसर बोर्ड पर दोहरे मापदंड अपनाने का आरोप भी लगाया। उन्होंने पत्रकारों से अपील की कि वे इस मुद्दे पर सख्त सवाल पूछें कि कुछ फिल्मों को आसानी से मंजूरी मिल जाती है, जबकि कुछ फिल्मों को वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ फिल्मों को रेड कार्पेट मिलता है, जबकि कुछ को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि किसी डायरेक्टर के कई वर्षों की मेहनत को इस तरह रोक देना कितना सही है।
अपने नोट के आखिर में कामरा ने लिखा, ‘नेहरू के समय में इस तरह के मामलों को कोर्ट में चुनौती दी जाती थी।’
खालरा को फिर ‘अगवा’ कर लिया गया है
उन्होंने सवाल किया कि अगर सच्ची कहानियां दिखाने पर इतनी रुकावटें आएंगी, तो आखिर किस तरह का सिनेमा आगे बढ़ेगा। अंत में उन्होंने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि जसवंत सिंह खालरा को एक बार फिर ‘अगवा’ कर लिया गया है- इस बार सीबीएफसी द्वारा।
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बता दें कि ‘सतलुज’ फिल्म का निर्देशन हनी त्रेहान ने किया है और इसमें दिलजीत दोसांझ ने मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा का किरदार निभाया है।