उत्तर के एक होनहार ने अपनी मेहनत के दम पर दक्षिण में पहचान बना ली है। दक्षिण भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में किए गए इनके काम की चारों तरफ सराहना हो रही है। लेकिन दृश्यों और तस्वीरों की जबर्दस्त समझ रखने वाले इस होनहार की मेहनत को असली पहचान दिलाने की जिम्मेदारी अब आप पर है।
जी हां, हम बात कर रहे हैं, सीनमैटोग्राफर कर्म चावला की। दिल्ली विश्वविद्यायल से पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने फैमिली बिजनेस संभालने से इनकार कर दिया। फिल्म इंडस्ट्री में कोई गॉडफादर न होने के बावजूद अपने दिल की सुनी और संघर्ष के रास्ते पर चल पड़े।
इसी दौरान सीनमैटोग्राफी के अपने प्यार को और तराशने के लिए चेन्नई के एलवी प्रसाद एकेडमी जा पहुंचे। यही इनका वास्ता दक्षिण के सिनेमा से पड़ा। पढ़ाई पूरी करने के बाद वो अपने गुरु बॉबी सिंह के साथ कई फिल्मों में काम किया। इस दौरान वो लगातार सीनमैटोग्राफी की बारीकियों पर काम करते रहे।
इनकी ये मेहनत रंग लाई और पहली बार खुद के दम पर इन्होंने रक्षित सेट्टी की कन्नड़ फिल्म 'उलिडावरू कंडांथे' की सीनमैटोग्रफी की। इनकी इस पहली फिल्म की सिनमैटोग्राफी खूब तारीफें बटोर रही है। यही नहीं कर्म चावला को इसके लिए कन्नड़ फिल्म इंडस्ट्री में सर्वश्रेष्ठ सीनमैटोग्राफर की श्रेणी में नामांकित किया गया है।
अब वहां पर उत्तर का पताका फहराने के लिए जरूरत है आपके समर्थन की। नीचे उस फिल्म का ट्रेलर दिया गया है, देखकर आप अपना वोट इस मेहनतकश शख्स को दे सकते हैं। इसके लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।
कर्म चावला से जब इस श्रेणी में नामित होने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वो उस श्रेणी में अपना नाम देखकर तनाव में आ गए हैं। उन्होंने फिल्म के दौरान बस पूरी मेहनत से शूटिंग की थी, लेकिन इतनी बड़ी सफलता का उन्हें विश्वास न था। भाषा की समस्या को लेकर वो कहते हैं कि उन्हें दृश्यों की भाषा समझ आती है। उनके मुताबिक तस्वीरों की अपनी भाषा होती है। इसे समझने के लिए दिल से जुड़ाव जरूरी है, किसी खास भाषा की जानकारी नहीं।
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ये रहा फिल्म का ट्रेलर