फिल्मी गीत में आपने एक 'फ्री वर्स' शैली की शुरुआत की थी। वह सिलसिला कैसे शुरु हुआ?
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ग्रेट शो मैन राजकपूर फिल्म 'मेरा नाम जोकर' बना रहे थे। मैं अलीगढ़ के डीएस कॉलेज में लेक्चरर था। बुलावे पर यहां से ६ दिन की छुट्टी लेकर मुंबई गया। राज बोले यार नीरज इस फिल्म का केंद्रीय किरदार जोकर है। उसके लिए गीत लिखना है। तीन दिन तक राज कपूर किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सके।
बस सिटिंग के लिए आते और चर्चा करके चले जाते। चौथे दिन मैंने उनसे कहा कि राज सहाब जोकर के लिए गैर परंपरागत गीत लिखना होगा। राज बोले क्यों? तब मैंने कहा कि जोकर से गीत की किसी परिष्कृत शैली की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। वह न तो ठुमरी गाएगा न गजल गाएगा और न कव्वाली गाएगा। राज बोले लेकिन गीत में जीवन दर्शन भी चाहिए। तब मैंने कहा जोकर की हर बात द्विअर्थी होती है।
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राज बोले कुछ सुनाओ तब मैंने उन्हें अपनी कवि सम्मेलन की शैली गीत 'ऐ भाई जरा देखकर चलो, आगे भी नहीं पीछे भी, दाएं भी नहीं बाएं भी, ऊपर भी नहीं नीचे भी' सुनाया। इसे सुनकर राजकपूर का चेहरा खिल गया। बोले में ऐसा ही कुछ चाह रहा था। हालांकि इस गीत में न तो मुखड़ा था, न अंतरा था। यह गीत की नई शैली थी जिसे राजकपूर ने फिल्म 'आज कल और कल' में भी रिपीट करवाया। बाद में आनंद बख्शी ने भी इस शैली के साथ कई गीत लिखे। जैसे 'अच्छा तो हम चलते हैं'
और इस तरह से रचते रहे हैं गीत
मंचीय गीत और फिल्मों के लिए गीत लिखने में क्या अंतर है?
फिल्म के लिए गीत लिखना उतना आसान नहीं है जितना कि मंच के लिए लिखते समय है। मंच के लिए गीत लिखते समय सीमाएं आड़े नहीं आती हैं। लेकिन फिल्म के लिए गीत लिखते समय सिचुएशन, धुन, किरदार और फिल्म में उसकी ग्राह्यता जैसे बिंदु ध्यान में रखने पड़ते हैं। उदाहरण के लिए अगर मैं किसी से कहूं कि एक दो तीन हो जाओ तो वह शायद क्या सोचे? लेकिन फिल्म में इसका प्रयोग यूं हुआ कि 'कोई हसीना जब रूठ जाती है तो और भी हसीन हो जाती है, टेशन से गाड़ी जब छूट जाती है तो एक दो तीन हो जाती है' यहां पर आप इन साधारण शब्दों के प्रयोग से संगीत के साथ पैदा हुआ सौंदर्य देख सकते हैं।
इसके अलावा फिल्म में लिखते समय अक्सर पहले धुन बना दी जाती है उस पर गीतकार को लिखना होता है। मैंने भी ऐसे कई संगीतकारों के साथ काम किया जो पहले धुन बना देते थे। लेकिन फिल्म 'मेरा नाम जोकर' के गीत के साथ अलग ही किस्सा हुआ। 'ऐ भाई जरा देख के चलो' राजकपूर को तो बेहद पसंद आया लेकिन शंकर (शंकर जयकिशन) ने धुन बनाने से इनकार कर दिया। बोले यह कैसा गीत है। तब राजकपूर ने मुझसे मेरे ही अंदाज में गीत पढ़वा कर सुनवाया। बाद में इसी अंदाज को धुन में पिरोया गया।
जानिए कौन से गीतकार हैं पसंद?
दादा जब आप किशोर और युवा थे तब आपकी पसंद के गीत और गीतकार कौन थे?
बच्चन उस समय अपने शिखर पर थे। उनका अंदाज और काव्य दोनों ही अविस्मरणीय हैं। इसके अलावा उस समय साहिर लुधियानवी, शकील बदायूंनी, कैफी आजमी, मजरूह सुल्तान पुरी के गीतों का जमाना दीवाना था। साहिर का लिखा फिल्म 'प्यासा' का गीत 'ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया....ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' मुझे बेहद पसंद होता था। साहिर के इस फिल्म में गीत यथार्थवादी थे। 'जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहा हैं' जैसे गीतों ने वंचित वर्ग में ऊर्जा भर दी थी। यही वह दौर था जब फिल्म जगत में समाजवादी विचारधारा का पदार्पण हो रहा था।
आज फिल्मों में आप गीत की क्या स्थिति पाते हैं और इसका भविष्य क्या है?
गीत का भविष्य बेहद शानदार है। गुलजार, प्रसून जोशी सहित कई नए गीतकार शानदार गीत लिख रहे हैं। लोक संस्कृति में रचे बसे गीतों को फिल्मों में ला रहे हैं। फिल्म 'दिल्ली ६' का गीत 'ससुराल गेंदा फूल' ऐसा ही एक गीत है। गीत हमेशा जिंदा रहेगा। (इसी के साथ नीरज शून्य में ताकते हुए अपनी ही कुछ पंक्तियों का उल्लेख करते हैं) मैंने कहा भी है कि 'गीत मर जाएंगे तो क्या यहां रह जाएगा, इक सिसकता आंसुओं का कारवां रह जाएगा'। गीत में स्पंदन है। लय है जीवन है और इनसे मिलने वाला आनंद है। इसलिए गीत की शैली और स्वरूप बदल सकता है लेकिन आत्मा वही रहेगी।
एक फिल्म आई है अभी विलेन (वह एक विलेन का जिक्र कर रहे थे) उसमें एक गीत है 'यूं मिले हो तुम मुझसे जैसे बंजारे को घर। यह गीत बेहद पसंद आ रहा है। यह गीत शायद किसी मिथून ने लिखा और संगीतबद्धï किया है। मैं इनसे कभी मिला नहीं हूं लेकिन गीत सुनकर लगता है कि इनमें अपार संभावनाएं हैं।
आपके मोबाइल में कौन से गीत की रिंगटोन है?
अंजान के लड़के (वह गीतकार समीर का जिक्र कर रहे थे) ने गीत लिखा है 'बहुत प्यार करते हैं तुमको सनम' वही आजकल मोबाइल में सेट है। हल्के फुल्के अंदाज का अच्छा गीत है।
मुंबई कब से जाना नहीं हुआ? आखिरी गीत कौन सा लिखा था?
टीवी शो के सिलसिले में अक्सर मुंबई जाना होता है। देवानंद की आखिरी फिल्म 'चार्जशीट' में गीत लिखा था 'मेरा इश्क भी तू, मेरा प्यार भी तू;। यह भी इत्तेफाक है कि देव साहब की पहली निर्देशित फिल्म 'प्रेम पुजारी' में भी मैंने गीत लिखे थे और उनकी आखिरी फिल्म में भी मेरा गीत रहा। उनके साथ मेरा करीब ४० साल का साथ रहा। उनके गुजर जाने के बाद मायानगरी से मेरा एक मजबूत ताल्लुक टूट गया।