-मोटिवेशनल टॉक्स में आपसे सवाल-जवाब होते हैं, तो क्या पाते हैं? आज लोगों की समस्याएं क्या हैं? आप उन्हें किस तरह समझाते हैं?
इंसान तो इंसान है। सॉफ्टवेयर इंजीनियर हो या किसी ऑफिस में काम करने वाला। उसके दिमाग में चलने वाली समस्याएं एक हैं। हम भले ही समाज में, परिवार में रहें, लेकिन हम अपने आप में भी रहते हैं। लोगों के अरमान होते हैं, नाकामियां मिलती हैं। सवाल यह है कि आप जिंदगी से क्या चाहते हैं? क्या आप अरमानों को पूरा कर सकते हैं? अगर वे पूरे नहीं हुए तो खुश कैसे रह सकते हैं, क्योंकि जैसे ही आपके भीतर अरमान पैदा होते हैं, वैसे ही मुश्किलें भी नजर आने लगती हैं। यह मुश्किलें जीवन का संघर्ष हैं। मैं वहां फिल्म ऐक्टर की तरह बात नहीं करता, बल्कि आम आदमी की तरह होता हूं।
-जीवन में इस मुकाम तक पहुंचने में आपके सामने, जो मुश्किलें आईं, उन्हें क्या सोचते हुए पार किया?
एक ही रास्ता है कि संघर्षों को पार करें। अगर फेल हो जाएं, तो यह न सोचें कि सब खो गया। जब तक जिंदा हैं, तो फेल होने का सिर्फ यही मतलब है कि एक और बाधा आई है और सफल होने में थोड़ा ज्यादा वक्त लगेगा। 44 की उम्र में मेरी पहली फिल्म रिलीज हुई, तो मैं भी सोच सकता था कि अब क्या होगा? तब मैं फेल हो जाता। अब मुझे फिल्म बनानी है, 58 का हो गया हूं, दादा बन गया हूं, क्या यह सपना छोड़ दूं?
-आप खुद प्रेरित होने के लिए किन हस्तियों की किताबें पढ़ते/भाषण सुनते हैं?
बहुत सारे लोग हैं। अब्राहम लिंकन से लेकर महात्मा गांधी और मार्टिन लूथर किंग को लीजिए। फील्ड मार्शल सैम मानेक शॉ या जेआरडी टाटा की बातें सुनता हूं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। जितने बड़े लोग थे, उतने ही साधारण थे। फिल्मों में एंथनी हॉपकिंस और रॉबर्ट डी नीरो से लेकर हमारे अपने बलराज साहनी जी की बातें पढ़-सुन लीजिए। इनकी जिंदगियां देखिए। हमारे संघर्ष क्या हैं, इन लोगों के आगे?