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मैं अपनी माटी से बेपनाह मोहब्बत करता हूं : तिग्मांशु धूलिया

Sat, 27 Aug 2016 04:13 PM IST
अमित कर्ण/ अमर उजाला, मुंबई ब्यूरो
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तिग्मांशु धूलिया
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उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार की तर्ज पर अब उत्तराखंड भी  फ‌िल्म फ्रेंडली प्रदेश बनने की राह पर तेज रफ्तार से चल पड़ा है। इसके चलते ही राज्य का फिल्म विकास निगम गठित किया गया था। अब आनन-फानन में उनके वाइस चेयरमैन मशहूर निर्माता-निर्देशक तिग्मांशु धूलिया को नॉमिनेट किया गया है। उनका नौमिनेशन सीएम हरीश रावत ने किया है। दरअसल तिग्मांशु धूलिया की पैदाइश भले यूपी स्थित इलाहाबाद की है मगर उनका ननिहाल और ददिहाल उत्तराखंड में है। उन्हें अपनी जड़ो से लगाव भी है। ऐसे में वे अपने होम स्टेट में सिने माहौल को उम्दा करने का संकल्प कर रहे हैं।
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फ‌िल्म विकास निगम के संग वो एक अर्से से राज्य की फ‌िल्म नीति का मसौदा तैयार करने में सक्रिय रहे हैं।

क्रौंपिहेंसिव फिल्म नीति बना रहे हैं

तिग्मांशु धूलिया
अमर उजाला से हुई खास बातचीत में उन्होंने कहा कि मुझे अपनी माटी से बेपनाह मोहब्बत है। तभी मैं अपनी फिल्मों की शूटिंग वहां करता रहा हूं। पान सिंह तोमर तो वहां शूट कर चुका हूं और अपनी अगली फिल्म रागदेश भी अक्टूबर से वहीं शूट करने वाला हूं। राज्य के फिल्म विकास निगम के अधिकारियों से भी मैं लगातार संपर्क में हूं। वो क्रौंपिहेंसिव फिल्म नीति बना रहे हैं। इसको लेकर मैं सीएम साहब के भी सतत संपर्क में हूं। यह सही है कि छोटा राज्य हो तो वहां चीजें जल्दी होती हैं।

मुझे विकास निगम का चेयरमैन नामित किया गया है कि नहीं इसकी आ‌‌धिकारिक सूचना निजी तौर पर तो मुझे नहीं मिली है।  मैं अब यकीनन सिने सुविधाओं की बेहतरी को अपना खून-पसीना दूंगा। 

कमाल का लैंडस्केप मिल जाता है

दरअसल यहां जैसी हसीन वादियां गिनती के राज्यों में है। लिहाजा यहां कमाल का लैंडस्केप मिल जाता है। मानव संसाधन वाजिब कीमत पर मुहैया हो जाते हैं। देहरादून, ऋषिकेश, हरिद्वार व अन्य इलाके दिल्ली व भारत के प्रमुख शहरों से वेल कनेक्टेड हैं। चाहे सड़क यातायात हो या वायुमार्ग। मूल निवासियों में कला व संस्कति से बेशुमार मोहब्बत है। यहां के नुक्कड़-नाटक व प्ले ग्रुप काफी एक्टिव व मजबूत हैं। तभी मुझे अपनी  फ‌िल्मों के लिए मनचाही तादाद में कलाकार मिल जाते हैं।  वहां क्राइम रेट जीरो है। इन सब सुविधाओं व खूबियों के बावजूद यहां के कुमाऊं व गढ़वाली सिनेमा की हालत खस्ता है।

मूल वजह इसके प्रति प्रशासनिक उदासीनता रही है। करण जौहर ने स्टूडेंट ऑफ द इयर भी वहीं शूट की थी। मगर वहां ज्यादा सिनेमाहॉल नहीं हैं। 
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सुविधाओं व संसाधनों की कमी नहीं होगी

प्ले ग्रुप को मिलने वाली सुविधाओं व संसाधनों की कमी भी है। वो बस शहरी इलाकों तक सिमटे हुए हैं। स्थानीय कलाकारों व फ‌िल्मकारों के प्रोत्साहन को कोई अतिरिक्त प्रावधान नहीं हैं। यह सब करने की जरूरत है। हमारे सामने यूपी का नवीनतम उदाहरण है। फ‌िल्म फ्रेंडली नीतियों की वजह से वहां जमकर फ‌िल्में शूट हो रही हैं। ये सारी बातें मैंने उत्तराखंड के सीएम साहब से की थीं कि वे राज्य के सिनेमाघरों में कुमाऊं और गढ़वाली सिनेमा के लिए ऐसे नियम लागू करें। आशा है कि इस दिशा में तेज रफ्तार से काम होगा। मुझे पूरे प्रदेश से बहुत प्यार है। मेरी पैदाइश व पढ़ाई- लिखाई तो इलाहाबाद की है मगर मैं बचपन से हर सर्दी और गर्मी की छुट्टियों में वहां जाया करता था। कोटद्वार मेरा ‌ददिहाल है जबकि देहरादून ननिहाल। मेरा हाफ हॉलिडे वहीं बीतता था।

इस तरह वहां से मेरी सुखद यादें जुड़ी हुई हैं। मैं मरते दम तक इस प्रदेश की प्रगति के लिए प्रयासरत रहूंगा।
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