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पहले औरत, फिर हिंदुस्तानी और मुसलमान: शबाना आजमी

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समानांतर और कमर्शियल दोनों फिल्मों में से कौन सा तुर्जबा बेहतर रहा? अंकुर, मंडी, निशांत, पार, अर्थ जैसी फिल्मों में अभिनय से अलग जगह बनाने वाली और परवरिश, अमर अकबर एंथनी जैसी कमर्शियल फिल्में करने वाली भी शबाना इस सवाल पर खुलकर अपनी बात रखती हैं।
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शबाना कहती हैं, दोनों अलग अलग दुनिया है। हमारे जमाने में फिल्मों में स्क्रिप्ट नाम की कोई चीज नहीं होती थी। कई बार ऐसा होता था कि मैं और राजेश खन्ना जब कोई सीन कर रहे होते थे तो पहले पेज के बाद दूसरे पेज का कुछ अता पता नहीं होता था।

शबाना बताती हैं, कादर खान किसी तीसरे स्टूडियो में बैठकर सीन लिख रहे होते थे। जाहिर है ऐसे माहौल में सीन में किसी तरह की सच्चाई लाना लगभग मुश्किल था।

आर्ट फिल्मों पर शबाना कहती हैं। श्याम बेनेगल और सामानांतर सिनेमा की फिल्मों में गहरे उतर कर काम करने का मौका मिलता था। क्योंकि इनकी पूरी स्क्रिप्ट होती थी, हकीकत से उसका वास्ता था।
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अगर सामानांतर फिल्में नहीं होती तो मुझे कभी अच्छे महिला प्रधान फिल्में नहीं मिलती। मेरे दौर में बॉलीवुड में औरत या तो देवी का रूप थी या फिर खलनायिका। लेकिन आर्ट हाउस फिल्मों ने औरत के मन के कई पहलुओं को टटोला।

'नौ साल की उम्र तक मैं कम्यूनिस्ट पार्टी के परिवेश में रही'

आर्ट फिल्मों के बाद आपने अमर अकबर एंथनी जैसी फिल्मों में काम किया। जो पूरी तरह मसाला फिल्म थी। इस पर शबाना कहती हैं, मुझे याद है फिल्म परवरिश में एक महीने तक मैंने और नीतू सिंह ने एक कुंए से लटकते हुए काम किया था। जिसमें एक मगरमच्छ था और उसे हमारी टांगों को खाना था।

शबाना कहती हैं कि आप सोच सकते हैं कि चेहरे पर किस तरह के भाव होंगे। लेकिन मैंने इन फिल्मों को इंजॉय किया वरना मैं इनमें काम ही नहीं करती। एक्टिंग को करियर बनाने के बारे में कब सोचा? इस सवाल पर शबाना काफी दिलचस्प जवाब देती हैं।

शबाना कहती हैं, 'तब मैं केवल चार महीने की थी। मां शौकत कैफी मुझे अपनी पीठ पर लाद कर पृथ्वी थियेटर रिहर्सल में ले जाया करती थीं। अब्बा कैफी आजमी मुझे मुशायरों में भी ले जाया करते थें।'

शबाना बताती हैं कि 'नौ साल की उम्र तक मैं कम्यूनिस्ट पार्टी के परिवेश में रही। वहां हर कॉमरेड के पास केवल 225 वर्गफीट के साइज़ का एक कमरा होता था। 8 परिवार एक बाथरुम और टॉयलेट शेयर करते थे।'

'इस माहौल में धीरे -धीरे थियेटर की तरफ रुझान हुआ। बाद में मैने पूना के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट में जाना शुरू किया। वहां वर्ल्ड सिनेमा देखने का मौका मिला। इस सब ने मुझ पर गहरा असल डाला।'

मैं एक औरत हूं। फिर एक हिंदुस्तानी हूं, मां हूं, बेटी हूं, बीवी हूं,

आप फिल्म एक्टर हैं, थिएटर भी करती हैं, सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं, आप खुद को कैसे देखती हैं? इस पर शबाना कहती हैं। 'सबसे पहले मैं एक औरत हूं। फिर एक हिंदुस्तानी हूं, मां हूं, बेटी हूं, बीवी हूं, अभिनेत्री हूँ, मुस्लिम हूं। सब एक साथ हैं एक्टिंग और एक्टिविज्म को मैं एक दूसरे से अलग नहीं मानती।

शबाना कहती हैं 'मैं सामाजिक कामों और अदाकारी दोनों से उन चीजों को बढावा देती हूं जिनमें मैं विश्वास करती हूं। मेरी परवरिश ऐसे माहौल में हुई है जहां मैंने सामाजिक बदलाव के लिए कला को हथियार की तरह इस्तेमाल करना सीखा।

फिल्म फायर में लेस्बियन का किरदार किया। विवादों के बावजूद ऐसे किरदार निभाने का निश्चय कहां से आता है? इस सवाल पर शबाना जवाब देती हैं 'ऐसा नहीं है कि मैं जानबूझकर विवाद पैदा करती हूं लेकिन मुझे सिखाया गया है कि जो सही है उसके लिए आवाज उठाओ।
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समलैंगिक लोगों के भी समान अधिकार हैं: शबाना

शबाना आजमी कहती हैं 'मुझे लगता है कि समलैंगिक लोगों के भी समान अधिकार हैं। इस किरादर को देखकर बहुत सारे लोग भौचक्के रह गए, कई नाराज थे, कुछ कशमकश में थे। पर कम से कम एक बहस शुरू हुई और किसी भी मुद्दे से निपटने का पहला कदम यही होता है.

आपकी कई बार आलोचना भी हुई है, खासकर सामाजिक सरोकारों से जुड़े मु्द्दों पर इससे कैसे निपटती हैं? इस पर शरबाना कहती हैं 'आलोचना को न नजरअंदाज करती हूं न गुस्सा आता है। अल्पसंख्यकों के अधिकार, एड्स, औरतों से जुड़े कई मुद्दों पर काम किया।

शबाना आखिर में कहती हैं कि 'लोगों ने मुझे बेपनाह मोहब्बत और इज्जत दी है. लेकिन एक तबका ऐसा भी होगा ही जिसे वाकई मेरा काम पसंद नहीं होगा। इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हर इंसान को अपना नजरिया जाहिर करने की आजादी है'।
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