एक समय पर्दे से लगभग गायब हो गयीं भुतही फिल्में एक बार फिर लौट आयी हैं। इस बार उनकी वापसी अलग-अलग तरह की फिल्मों से हुयी है। मार्च में रिलीज हुई 'आत्मा' और '3जी' के बाद 'अप्रैल' में एक थी डायन रिलीज हो रही है।
बॉलीवुड में भुतही शक्तियां एक बार फिर से सक्रिय हो गयी हैं। चुड़ैलों, रहस्यमय ताकतों जैसी बातों पर आधारित 'एक थी डायन' इस कड़ी में अगला नाम है।
इस चलन से हताश महिला समूहों का तर्क है कि 'डायन बताकर मारना (विच हंटिग)' मनोरंजन नहीं बल्कि एक दुखद तथ्य है, जो महिलाओं को निशान बनाने को बढ़ावा देता है।
बता दें कि हालिया प्रदर्शित 'राज 3' और 'तलाश' ने दर्शकों का मनोरंजन करने की आड़ में मिथकों को खूब प्रचारित किया है।
एकता कपूर और विशाल भरद्वाज द्वारा सहनिर्मित, अभिनेता इमरान हाशमी, कोंकणा सेन शर्मा और कल्कि कोचलिन अभिनीत 19 अप्रैल को प्रदर्शित होने जा रही 'एक थी डायन' का फोकस चुड़ैल की 'चोटी' पर है।
एकता को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस तरह की फिल्में 'विच हंटिग के नाम पर' महिलाओं के शोषण को बढ़ावा देती है।
एकता कहती हैं, "मैं नहीं जानती कि डायन की 'चोटी' दिखाने में अंध विश्वास को बढ़ावा देने जैसा क्या है।"
सवाल यह है कि इस तरह की फिल्मों का विशेष रूप से सीधे-सादे श्रोताओं पर क्या प्रभाव होगा जो इस धारणा को मजबूती देती हैं कि चुड़ैलों का अस्तित्व होता है।
'पार्टनर्स फॉर ला इन डेवलपमेंट' की कार्यकारी निदेशक मधु मेहरा कहती हैं, "मीडिया को अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति अधिक सतर्क होना चाहिए।
जब हिसा और अंधविश्वास से भरी फिल्में बना रहे हैं, तो जरूरी है कि मनोरंजन के नाम पर इस तरह के विचारों को बढ़ावा, सशक्तता और वैधता देने से बचें।"
बीते 100 वर्षो से अधिक के सफर में भारतीय सिनेमा ने डरावनी फिल्मों, दैवीय शक्तियों और कुछ प्रचलित बुराइयों की अवधारणा को मजबूती दी है।
अभिनेता ऋषि कपूर और श्रीदेवी अभिनीत फिल्म 'नगीना' को लीजिए। इस फिल्म में भेष बदलने में माहिर नागिन बदला लेती है।
अनेकों दर्शकों के लिए यह मनोरंजन हो सकता है लेकिन देश के सुदूर अंचलों में रहने वाले अधिकांश लोग फिल्माए गए मिथकों पर भरोसा करने लगते हैं।
देश के पिछड़े हिस्सों से विच हंटिंग से जुड़ी दिल दहला देने वाली अनेक खबरें आई हैं। फिर भी 'राज', 'राज 3' और 'आत्मा' में काम कर चुकीं अभिनेत्री बिपाशा बसु मानती हैं कि फिल्मकारों के पास भारतीय संदर्भ अवश्य होना चाहिए या फिल्में आमजन का मनोरंजन करने वाली होनी चाहिए।
बिपाशा कहती हैं, "भारत में यदि हम डरावनी फिल्मों के साथ प्रयोग कर रहे हैं तो हमें दर्शकों को एक अच्छी कहानी, बेहतरीन परफार्मेस और डर की छौंक देना पड़ता है। तभी ये मनोरंजक होगा।"