पेड़, पहाड़ और प्रकृति हमेशा से रचनाकारों के प्रेरणास्रोत रहे हैं। मशहूर गीत-गजलकार गुलजार ने पहाड़ों में पेड़ों पर निर्ममता के साथ चल रही आरियों पर अपनी पीड़ा इन लफ्जों में बयां की। ‘देवदार के पेड़ को काटकर ले गया कोई, पगडंडी से कारखाने में और पत्थरदिल इंसान को रहम न आया’।
मसूरी के वुडस्टॉक स्कूल में चल रहा ‘मांउटेन राइटर्स’ फेस्टिवल शुक्रवार को गुलजार की कविताओं और नज्मों से गुलजार रहा। लोग एक-एक लफ्ज से आनंदित होते रहे। हर नज्म और गजल पर देर तक तालियां बजती रहीं। कार्यक्रम में उनकी रचनाओं का अंग्रेजी काव्यानुवाद भी पेश किया गया।
पहाड़ के हुस्न को गुलजार ने इन शब्दों में ढाला ‘दूर देवदार के पेड़ कभी बादल की पगड़ी पहने और कभी दुशाला लपेटे, सरसराती हवा को अपने बांहों में थाम, साथ चलने की तमन्ना, हवा से बोला, पर पैर जकड़े न होता तो साथ चल लेता।’ पहाड़ों की पाकीजगी पर गुलजार ने यह कविता पेश की ‘पहाड़ गूंजते हैं वादियों में देवताओं को बुलाने के लिए, मंदिरों में भी बजती है घंटियां देवताओं को बुलाने के लिए, चिराग मेरे कहां गए पीर।’
गुलजार ने चर्चित कवियत्री सुप्रियता के अंग्रेजी कविता पाठ का हिंदी में तजुर्मा भी पेश किया। फेस्टिवल के संयोजक और चर्चित बालीवुड कलाकार टाम आल्टर के भाई स्टीफन आल्टर, निर्माता- निर्देशक विशाल भारद्वाज, लेखक गणेश शैली और एक्टर विक्टर बनर्जी और शेखर पाठक की मौजूदगी में श्रोता में देर तक गुलजार की कविताओं में खोए रहे।
अब मैं ‘ग्रीन पोयम्स’ लिख रहा हूं
अमर उजाला से बातचीत में गुलजार बोले अब वह ‘ग्रीन पोयम्स’ कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहाड़ रचनात्मकता के सबसे बड़े स्रोत हैं। उन्हें लेखन को गुरुवाणी से लेकर सुनील बंधोपाध्याय, आशुतोष, संत बुल्लेशाह, संत फरीद की रचनाओं ने बहुत मुतास्सिर किया। गुलजार बोले- प्रकृति को बचाने का दायित्व सभी का है। प्रकृति और पहाड़ बचेंगे, तभी साहित्य बचेगा।