'दीना' वाले मक्खन सिंह
ते 'काला' वाली सुजान कौर
दा ब्याह ना हौंदा तो मैं कित्थे हौंदा
गुलजार अपनी किताब 'कुछ और नज्में' में अपना तार्रुफ कुछ इसी तरह कराते हैं। वही गुलजार, जिनके गीतों के बिना हिन्दी फिल्में अधूरी है, जिनके गीतों के बिना इजहार-ए-इश्क मुमकिन नहीं, जिनके गीत दिल टूटे आशिक का हौसला बढ़ाते हैं, जिनके गीतों को गांव से आकर शहर में छत ढूंढ़ता नौजवान गुनगुनाता है। गुलजार शायरी का एक चलता-फिरता स्कूल हैं। निर्देशन के वो मास्टर हैं और फिल्मी गीतों में किस तरह जिंदगी के मसाइल को बयां करना है, इसका हुनर गुलजार से बेहतर भला कौन जानता है। मशहूर गीतकार और फिल्मकार गुलजार आज अपना 82वां जन्मदिन मना रहे हैं।
झेलम नदी के किनारे बसे झेलम शहर के दीना में मक्खन सिंह के यहां 18 अगस्त 1934 को पैदा हुए संपूर्ण सिंह। जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है और बंटवारे में गुलजार का परिवार भारत आ गया। सिक्ख कालरा परिवार में पैदा हुए तो नाम के साथ जुड़ा कालरा और नाम मिला संपूर्ण सिंह कालरा। संपूर्ण सिंह कालरा, जिन्हें हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और पूरी दुनिया में हर वो शख्स जो शायरी और भारतीय फिल्मी गीतों का शौकीन है, गुलजार के नाम से जानता है। गुलजार का परिवार कोई शायरों का परिवार नहीं था लेकिन गुलजार जरा अलहदा थे, उन्हें परिवार के बिजनेस से कुछ अलग करना था। दूरदर्शन के लिए गौरा धवन लाल को दिए इंटरव्यू में गुलजार ने अपनी कई बातें साझा की हैं, इस इंटरव्यू में अपने शायरी के शौक पर गुलजार कहते हैं 'परिवार के लोगों को लगता था कि घर में एक मिरासी पैदा हो गया है जिसे घर के बिजनेस से कोई वास्ता नहीं बल्कि शायरी करना चाहता है और फिर घरवालों ने भी सोचा कि चलो ठीक है, कर लेने दो। दरअसल शायरी से पेट भरना उन दिनों बड़ा मुश्किल था इसलिए घर के लोग परेशान थे कि इसे ये क्या शौक लग गया है।'
गालिब से गुलजार का एक बड़ा अलग सा रिश्ता रहा है। दिल्ली में गुलजार का बचपन बीता और बल्लीमारान की गलियों से गुजरते हुए कब वो गालिब से एक रिश्ता बना बैठे शायद उन्हें भी अहसास ना रहा हो। गुलजार कहते हैं 'दिल्ली में जब में स्कूल में था तो मौलवी मुजीबुर्रहमान हमें उर्दू पढ़ाते थे, वो एक गजल को तरन्नुम के साथ पढ़ते थे और फिर एक-एक शेर के मायने बताते थे, उसे समझात थे। मौलवी साहब ने गालिब पढ़ाया तो उनसे जुड़ाव हो गया'। गालिब के बारे में आगे गुलजार कहते हैं 'गालिब को चचा गालिब कहते हैं, किसी और शायर को तो मामा या भय्या नहीं कहा। दरअसल गालिब घर के ऐसे बड़े हैं जिनसे बच्चे डरते नहीं है बल्कि उनकी जेब में हाथ डाल कर सिक्के ढूंढ़ते हैं, बस यही बात है जो गालिब को सबके करीब करती है और मेरे भी करीब करती है।'
गुलजार का फिल्मी सफर 1963 में आई बिमल रॉय की फिल्म 'बंदिनी' से शुरू होता है। फिल्म में नूतन पर फिल्माया गया गाना 'मोरा गोरा रंग लइले' गुलजार की कलम से निकला और इतना मकबूल हुआ कि फिल्म के निर्देशक बिमल रॉय को वो भा गए। गुलजार को ये मौका कैसे मिला वो खुद बताते हैं 'मैं एक मोटर गैराज में काम करता था, जहां मैं गाड़ियों को बेहतर रंग कैसे दिया जाए ये देखा करता था, इसके साथ-साथ लिखने और पढ़ने का बहुत शौक था। प्रोग्रेसिव रायटर्स एसोसिएशन से जुड़ा था तो उस जमाने के कई बड़े शायरों को जानता था, इसी में शैलेन्द्र भी थे। बंदिनी के लिए गीत लिख रहे शैलेन्द्र और फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर सचिन देव बर्मन में कुछ अनबन हो गई और शैलेन्द्र ने डांट कर मुझको बिमल दा के पास भेज दिया, मैं फिल्मों में लिखना नहीं चाहता था लेकिन जब बिमल दा ने मुझे सिचुएशन बताई तो मैंने गाना लिख दिया, गाना था 'मोरा गोरा रंग लइले'। ये गाना बिमल दा को पसंद आया और उन्होंने कहा कि तुम मेरे साथ रहोगे, उन्होंने मुझसे कहा कि तुम मेरे असिस्टेंट हो लेकिन एक वादा करो कि वापस मोटर गैरेज में नहीं जाओगे'
गुलजार जब बिमल दा की बात करते हैं तो आंखों में आंसू भर लेते हैं वो कहते हैं 'जिस प्यार से बिमल दा ने कहा कि तुम वापस मोटर गैराज में नहीं जाओगे वो मेरे लिए एक अलग ही अहसास था। मैं उस प्यार पर रो ही दिया। बस वो दिन था कि बिमल दा को गुरू मान लिया और आज भी मानता हूं'।
आर. डी बर्मन के साथ रिश्ता
गुलजार और राहुल देव बर्मन ने मिलकर कई शानदार गाने दिए हैं, वो गीत जो कान में पड़ जाएं तो कदम ठिठक जाते हैं और दिल चाहता है कि कुछ देर सुन लिया जाए। गुलजार और आर डी बर्मन यानि पंचम दा में ये दोस्ती कैसे हुई इसका जवाब गुलजार देते हैं 'मै बिमल रॉय का असिस्टेंट और पंचम एस.डी. बर्मन यानि अपने पिता जी के, जब दो असिस्टेंट में दोस्ती हो गई। दोनों मिलकर लंबी-लंबी हांकते कि ये करना है, वो करना है। बचपन में दोस्ती हुई तो फिर तमाम उम्र चली'
गुलजार ने पाकिस्तानी टीवी चैनल के लिए कामरान शाहिद को 2013 में एक इंटरव्यू दिया। इसमें गुलजार ने अपने गीतों, निजी जिंदगी और पाकिस्तान से अपने लगाव पर कई सवालों के जवाब दिए। इसी इंटरव्यू में उन्होंने इजाजत फिल्म के गाने 'मेरा कुछ सामां, तुम्हारे पास पड़ा है' को लेकर पंचम दा के साथ हुए एक किस्से को बताया। गुलजार कहते हैं 'मेरा कुछ सामां, तुम्हारे पास पड़ा है' को जब मैंने पंचम दा को सुनाया तो कहने लगे कि इतना लंबा कहीं गाना होता है, फिल्म के डायलॉग लिखकर लाया है। मैं मनाऊं और वो तैयार ना हो धुन बनाने को ऐसे में काम आसान किया आशा भोसले ने, उन्होंने इसकी कुछ लाइनें गुनगुना दीं और पंचम को लगा कि दम है गाने में। गाना बना 'मेरा कुछ सामां, तुम्हारे पास पड़ा है' और ये बेहद मशहूर हुआ' गुलजार कहते हैं कि वो फिल्म की स्क्रिप्ट पढ़कर सिचुएशन को समझकर गाना लिखते हैं। गुलजार का कहना है कि ये भटूरे तलने जैसा काम नहीं है, आपको इसके लिए सीन और किरदार के बारे में पता होना चाहिए।
कामरान शाहिद ने गुलजार से मुंबई के उनके घर पर इंटरव्यू लिया और कहा, मैं तो आपको बचपन में लंबे वक्त तक आपको मुसलमान समझता रहा आपके नाम की वजह से। इस पर गुलजार कहते हैं 'तो आपको मेरे मुसलमान होने पर एतराज है क्या? मैं तीस साल से रोजे रखता हूं, हां अब कुछ सालों से सेहत ठीक ना होने की वजह से छूटने लगे हैं। आप कल्चरली मुझे मुसलमान कह सकते हैं' अपने नाम पर गुलजार कहते हैं कि उन्हें तो गुलजार कहलाना ही पसंद है और सभी किताबों पर भी गुलजार ही लिखा है और लोग भी मुझे गुलजार के नाम से ही जानें, यही ख्वाहिश है। गुलजार से जब पाकिस्तान के बारे में सवाल होता है तो वो कहते हैं कि पाकिस्तान मेरा वतन है और हमेशा रहेगा। उस धरती पर मैं पैदा हुआ हूं। गुलजार कहते हैं 'मैं पिछले दिनों ही पाकिस्तान गया था अपने घर भी गया, काफी तस्वीरें भी लाया'
गुलजार पाक एंकर से दोनों मुल्कों में अमन की बात करते हैं, जब अपनी खूबसूरत आवाज में वो पाक के कामरान शाहिद को वो एक नज्म सुनाते हैं तो उनके पास जवाब नहीं होता। गुलजार जो नज्म कामरान को सुनाते हैं वो कुछ यूं हैं।
लकीरें हैं तो रहने दो
किसी ने रूठ के शायद गुस्से में खींच दी थी
इन्हीं को अब बनाओ पाला और आओ कबड्डी खेलें।
मेरे पाले में तुम आओ, मुझे ललकारो, मेरे हाथ पर तुम हाथ मारो और भागो।
मैं तुम्हे पकड़ूं, तुमसे लिपटूं, तुम्हारी टांग खींचू और तुम्हे वापस ना जाने दूं।
तुम्हारे पाले में जब कबड्डी-कबड्डी करता जाऊं मैं
तो मुझे तुम भी पकड़ लेना
मुझे छूने ना देना वो सरहद की लकीरें किसी ने गुस्से में जो खींच दी थीं।
उन्हीं लकीरों को अब बनाओ पाला और आओ कबड्डी खेलें।।
जब कामरान का सवाल भारत-पाक के रिश्तों पर आता है, तो गुलजार बड़े नर्म से लहजे में कहते हैं, सियायत को रहने दो, हमारा काम तो मुहब्बत का है।
गुलजार अपनी निजी जिंदगी पर ज्यादा बात करना पसंद नहीं करते, खासकर अपनी शादी पर। गुलजार ने 1973 में अभिनेत्री राखी से शादी की। राखी जब गुलजार की जिंदगी में आईं तब उनका अपने पहले पति से तलाक हो चुका था। राखी और गुलजार की एक बेटी है मेघना। मेघना जब एक साल की ही थीं तो दोनों के रिश्तों में दरार आ गई और दोनों ने अलग होने का फैसला कर लिया। दोनों को अलग हुए एक अरसा बीत गया है लेकिन आज भी दोनों के बीच कोई डोर है, जिसनें कभी दोनों को बहुत दूर नहीं होने दिया। भले ही दोनों अलग रहे लेकिन कभी तलाक नहीं लिया। बताते हैं कि गुलजार हर हफ्ते राखी से मिलने जाते हैं। अपनी शायरी, गीतों और फिल्मों से दुनिया को देखने के लिए एक अलग नजर देने वाले गुलजार को सालगिरह की बहुत मुबारकबाद।