विदेशों में भी किए शोज
उस्ताद गुलाम सादिक खान ने ख्याल गायकी में विशेषज्ञता हासिल की और ठुमरी, दादरा और भजन गाए। उन्होंने भारत के साथ ही यूके, ऑस्ट्रेलिया, साऊदी अरब, ओमान, मॉरीशस, सिंगापुर, हांकांग, इंडोनेशिया, थाईलैंड, अफगानिस्तान और चीन में भी अपने हुनर का प्रदर्शन किया था। इसके साथ ही वह आकाशवाणी और दूरदर्शन के शीर्ष श्रेणी के कलाकार थे।
उस्ताद गुलाम सादिक खान
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डीयू में थे सीनियर लेक्चरर
उन्होंने जसपिंदर नरूला (बॉलीवुड गायिका) और उनके बेटे, उस्ताद गुलाम अब्बास खान, जो एक ख्याल और गजल गायक हैं, सहित कई लोगों को शिक्षा दी है। उन्होंने अपने पोते गुलाम हसन खान को भी शिक्षा दी, जो एक हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक हैं। इसके अलावा वह दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में संगीत संकाय में सीनियर लेक्चरर के रूप में काम करते थे।
2005 में मिला पद्मश्री
रामपुर-सहसवान घराने के उस्ताद गुलाम सादिक खान को 2005 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। उस्ताद गुलाम सादिक खान ही नहीं उनके घराने में अब तक बहुत लोगों को ये सम्मान मिल चुका है। शुरुआत में उस्ताद गुलाम सादिक खान को धीमी पहचान मिली, लेकिन जब उन्हें लोग पहचानने लगे तो उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 15 से 27 साल की उम्र में उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन 1956 में देश भर में प्रसिद्ध हो गए। पहले उन्हें लोगों के पास जाकर कार्यक्रम के लिए पूछना पड़ता था और बताना होता था कि वह कौन हैं, लेकिन बाद में सब आसान हो गया।
उस्ताद को पद्मश्री से सम्मानित करते पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम
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गुरु को देते थे भगवान का दर्जा
एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था, ‘मैंने 10 से 12 साल तक रियाज में संघर्ष किया और पांच साल तक रोजाना 10 घंटे से ज्यादा अभ्यास किया। मेरे पास नियमित रूप से कार्यक्रम आने लगे और कठिन समय के बाद मेरी पहचान बन गई। मैंने सीखा कि संगीत में ईमानदारी सबसे बड़ी चीज है। साथ ही उस्ताद पर विश्वास और निर्भरता सर्वोपरि है। उन्हें भगवान के रूप में माना जाना चाहिए।’ वहीं, 15 मई 2016 को गुलाम सादिक खान का 76 वर्ष की आयु में निधन हो गया।