यूं तो पारंपरिक परिभाषा यही है कि 'कथा कहे सो कथक कहाए'। ये अलग बात है कि जब बात छोटी मोटी कथा-कहानियों से आगे निकलती है तो " हरि हो ..गति मेरी" जैसी कथक कोरियोग्राफी देखने को मिलती है। कथक नृत्यागंना गौरी दिवाकर की इस कोरियोग्रफी का प्रीमियर दिल्ली में हुआ। हरि हो ..गति मेरी टाइटल अपने आप में अलग है। हरि हो हरि हो हरि हो ..गति मेरी ...ये पंक्तियां मुबारक अली बिलग्रामी का है। बिलग्रामी इस्लाम को मानते थे लेकिन उन्होंने हरि में अपनी गति, अपनी मुक्ति ढूंढ़ी।
मुबारक अलि बिलग्रामी उस परम्परा का हिस्सा थे जहां दूसरे धर्म को मानने के बावजूद कवियों ने खुल कर कृष्ण भक्ति में गीत और पद लिखे। गौरी दिवाकर की प्रस्तुति " हरि हो गति मेरी " पूरी तरह से मुस्लिम कवियों की कविताओं पर आधारित है जिन्होंने कृष्ण भक्ति में गीत और कविता लिखी।
इस कार्यक्रम की रुपरेखा तैयार करने वाले संजय नंदन का कहना है कि आज के दौर में ये जानना बेहद जरुरी है कि इसी देश में कई ऐसे लोग हुये जो मस्जिद में सजदा करते थे और साथ-साथ ही साथ कृष्ण भक्ति में नज्म लिखा करते थे। हसरत मोहानी, सैय्यद मुबारक अली बिलग्रामी, मियां वाहिद अली , मल्लिक मोहम्मद जायसी ऐसे ही कुछ नाम हैं। " हरि हो ..गति मेरी" के प्रीमियर में जितनी बड़ी संख्या में लोग पहुंचे ..और हाल में जितनी तालियां बजी उससे लगता है ..आपसी समझ और साझेदारी का भाव हमारी रगों में हैं।
मोही तोही राही (राधा) अंतर नाहिं....जइस दिख पिंड परछाहीं ( मल्लिक मोहम्मद जायसी )। ऊपरी तौर पर इसका अर्थ है कि कृष्ण राधा को कह रहे हैं कि तुममे और मुझमें कोई अंतर नहीं है। ठीक उसी तरह जैसे ज्योति पिंड और उसकी परछाई एक होती है, लेकिन गहराई में जाएं तो परमात्मा स्वयं कह रहे है अपने भक्तों से कि तुममे और मुझमें कोई अंतर नहीं है। मैं और तुम एक ही हो हैं ...तुम मुझे ढूढ़ते खुद ही खो जाओगे मुझ में। इस तरह के गहन भाव को जिस सहजता के साथ गौरी दिवाकर ने मंच पर प्रस्तुत किया वही उनकी सबसे बड़ी खासियत है। इसलिए आप सिर्फ नृत्य को देखते नहीं है महसूस करने लगते हैं। आप उसका हिस्सा बन जाते हैं।
गौरी दिवाकर गुरु बिरजू महाराज, जयकिशन महराज और अदिति मंगलदास की शिष्या रही हैं, इसका असर उनकी प्रस्तुति में दिखाई देता है। हरि हो गति मेरी की सफलता के पीछे नृत्य संयोजन, कोरियोग्राफी का बड़ा हाथ है। अदिति मंगलदास की कोरियोग्राफी आपको कभी भी सहज नहीं होने देती है। कुछ भी प्रीडिक्टेबल नहीं होता। इस कार्यक्रम में गौरी दिवाकर के साथ तबले पर योगेश गंगानी, पखावज पर आशीष गंगानी ने साथ दिया। पढ़ंत पर मोहित गंगानी थे और इसका संगीत समीउल्ला ने तैयार किया था।