फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सफर-ए-सेंसर: इस फिल्म को मिला था सेंसर बोर्ड का पहला 'ए' सर्टिफिकेट

Wed, 01 Mar 2017 06:08 PM IST
amarujala.com- विनीता वशिष्ठ
विज्ञापन
चेतना
विज्ञापन
सेंसर बोर्ड ने 'लिप्सिटक अंडर माई बुर्का' को 'ए सर्टिफिकेट' देने से इनकार क्या किया, सेंसर बोर्ड लोगों की जुबान पर आ गया। क्या आपको पता है कि सेंसर बोर्ड का पहला 'ए सर्टिफिकेट' पाने वाली फिल्म कौन सी थी। किस फिल्म पर सेंसर को इतना एतराज था कि बच्चों के सामने लाना उसे गवारा नहीं हुआ।
विज्ञापन


दरअसल 'ए सर्टिफिकेट' पाने वाली फिल्में वो फिल्में होती है जिन्हें केवल वयस्क देख सकते हैं। ऐसी फिल्मों पर ए का ठप्पा लगाया जाता है ताकि बच्चे यानी 18 साल से कम उम्र के लोग इन्हें न देख पाएं।

हालांकि इस बात पर काफी मतभेद रहे हैं कि भारत में ए सर्टिफिकेट पाने वाली सबसे पहली फिल्म कौन सी रही है। दो फिल्मों के बारे में अक्सर बाती की जाती है, आप भी जान लीजिए
विज्ञापन


यहां 1929 में रिलीज हुई डाक्यूमेंट्री फिल्म सोशल इवेल का जिक्र करना जरूरी होगा क्योंकि सेंसर बोर्ड की सबसे पहली गाज इसी पर गिरी थी। इस डाक्यूमेंट्री फिल्म में युवाओं की सेक्स समस्याओं को सुलझाने की कोशिश की गई थी और कुछ बोल्ड और सेक्स संबंधी शब्दों का भी प्रयोग किया गया था। 

चूंकि यह डाक्यूमेंट्री फिल्म थी इसलिए कुछ लोग इसे 'ए सर्टिफिकेट' पाने वाली पहली फिल्म का तमगा नहीं देते।

1970 में निर्देशक बीआर इशारा की फिल्म 'चेतना' को सही मायनों में 'ए सर्टिफिकेट' पाने वाली पहली फिल्म कहा जाता है। इस फिल्म में निर्देशक ने वेश्याओं के जीवन और उनके पुर्नवास के मुद्दे को उठाया था। कई दृश्यों पर सेंसर बोर्ड को आपत्ति थी कि बच्चों को ये नहीं देखना चाहिए।
विज्ञापन

सफर-ए-सेंसरः ये रही 'ए' सर्टिफिकेट पाने वाली पहली फिल्म, क्यों मिला 'ए' का ठप्पा

सेंसर
'ए सर्टिफिकेट'  मिलने के चलते देश भर में फिल्म को लोकप्रियता मिली औऱ फिल्म हिट हो गई लेकिन रिहाना के करियर पर फुल स्टॉप लग गया। उनका पैरों वाला पोस्टर आज भी गाहे बगाहे चर्चा में आ जाता है।

कुछ लोग यह भी दावा करते हैं कि 1950 में आई फिल्म 'हंसते आंसू' को सेंसर बोर्ड का 

पहला 'ए सर्टिफिकेट' मिला था। इसके पीछे एक मजाकिया मुद्दा भी उठता है कि सेंसर बोर्ड को फिल्म के नाम पर ऐतराज था कि हंसते हुए आंसू कैसे हो सकते हैं भला।

मधुबाला और मोतीलाल इस फिल्म की स्टारकास्ट में शामिल सितारे थे।

तीसरी एक और फिल्म का जिक्र होता है जिसे 'ए सर्टिफिकेट' देने की बात होती है। 1973 में फिल्म आई 'गरम हवा' जो बंटवारे के बाद भारत में बचे रह गए मुस्लिमों की स्थिति को बयान कर रही थी। एम एस सथ्यू की इस फिल्म में बेबाकी से राजनीतिक हालातों का जिक्र था जिसके दुष्प्रभाव से सामान्य जनता का जीवन कैसे बिगड़ता है।

लेकिन इस फिल्म के विषयवस्तु और मुद्दे से सेंसर बोर्ड खफा हो गया और फिल्म सेंसरशिप के मुद्दे को लेकर छह माह तक अटकी रही। कलाकारों और बुद्धिजीवियों ने फिल्म के समर्थन में हवा बनाई औऱ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और सूचना प्रसारण मंत्रालय के हस्तक्षेप के बाद फिल्म को सेंसर किया जा सका और फिर वो सिनेमाघरों में लगी।

लेकिन सही मायने में देखा जाए तो ये फिल्म सेंसरशिप के चलते अटकी पहली फिल्म कहलाएगी न कि पहली अडल्ट मूवी।


 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें