जयराम जयललिता आज एक जानी पहचानी राजनीतिक शख्सियत हैं। लेकिन साठ-सत्तर के दशक में ऐसा नहीं था। उन दिनों मेरे एक मित्र हुआ करते थे, नाम था टी. प्रकाश राव। उर्दू-पंजाबी के नामी लेखक रजिन्दर सिंह बेदी के साथ उनका याराना था। उन दोनों की एक फिल्म थी `इज्जत’।
उसका लेखन बेदी ने किया था और निर्देशन प्रकाश राव ने। उन दिनों अपने आवास पर हर महीने-दो महीनों के अंतराल पर मैं एक मिलन गोष्ठी आयोजित किया करता था। धर्मवीर भारती और रजिन्दर सिंह बेदी जैसे साहित्यकारों से लेकर चेतन आनन्द और भारत भूषण सरीखे फिल्मकारों तक सभी नामी-गिरामी लोग अनिवार्य रूप से उन गोष्ठियों में भाग लेते थे।
धर्मेंद्र ने पहचाना जया को
अवसर पर प्रकाश राव के साथ वहां एक युवती उपस्थित हुई। धर्मेंद्र ने तो उसे पहचान लिया, लेकिन बाकी लोग उसके प्रति अनजान ही इस बने रहे। पूछने पर मालूम हुआ कि वह प्रकाश राव की निर्माणाधीन फिल्म में सेकंड लीड कर रही है और उसका नाम है जयललिता।
लंबी, गोरी, सुदर्शन और पूरी तरह छरहरी जयललिता अन्य अभिनेत्रियों से अलग लगी। नई होने के बावजूद उसमें जिस आत्मविश्वास का समन्वय था, उसने हम सबको एकबारगी चमत्कृत ही कर डाला। गोष्ठी में फणीश्वरनाथ रेणु और नागार्जुन जैसे साहित्यकार भी मौजूद थे।
जयललिता ने ही की पहल
नागार्जुन उससे कुछ पूछने का उपक्रम करते इसके पहले ही वह उनसे कह बैठी थी, `आपका नाम नागार्जुन है न? पिछले महीने सारिका में आपका सेल्फ-पोर्ट्रेयल पढ़ चुकी हूं। बहुत अच्छा सटायर है अपने ऊपर। उसमें छपी तस्वीरों से ही आपको पहचाना।’
हम सब लोग भौचक होकर उसकी ओर देखते रह गए थे।
आगे कुछ कहने-सुनने की कोई जरूरत ही नहीं थी। जयललिता को शुरू से ही पढ़ने लिखने का शौक रहा है। दक्षिण की चारों भाषाओं - तमिल, तेलुगू, कन्नड़ और मलयालम के अलावा हिंदी और अंग्रेजी का भी उन्हें पर्याप्त ज्ञान है और उन सभी में धाराप्रवाह भाषण करने में उन्हें महारत है।