Film Review: अक्षय ने असली 'पैडमैन' बनकर जमाया रंग, लोगों को किया जागरूक

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रवि बुले

-निर्माताः ट्विंकल खन्ना -निर्देशकः आर. बाल्कि -सितारेः अक्षय कुमार, राधिका आप्टे, सोनम कपूर रेटिंग *** नारीवादी विमर्श के बीच बीते कुछ दशक से ‘असली मर्द’ की तलाश जारी है। बॉक्सऑफिस पर इस रेस में अक्षय कुमार सबसे आगे हैं। पिछले साल टॉयलेटः एक प्रेमकथा में उन्होंने बताया कि पत्नी के लिए घर में टॉयलेट का इंतजाम करने वाला असली मर्द है। पैडमैन में उनका डायलॉग है, ‘औरत की शर्म से बड़ी कोई बीमारी नहीं है। शर्म को सम्मान में बदलने के लिए जो करना होगा करूंगा।’ शर्म यहां ‘मासिक धर्म’ है और सम्मान सैनेटरी पैड। फिल्म इस विषय को छुपाने/नकारने/अपवित्र बताने वाली सोच पर प्रहार करती है। आप भले ही पिछड़े न हों लेकिन पैडमैन बिना भेद-भाव के पूरे समाज को धिक्कारते हुए इन दिनों में महिलाओं के लिए सैनेटरी पैड के महत्व/इस्तेमाल/सस्ती दरों पर मुहैया कराने की मुहिम छेड़ती है। नायक-नायिका यहां नेताओं-सरकारी अधिकारियों की तरह आंकड़ों में बात करते हैं। कुछ दृश्यों में लगता है कि दूरदर्शन के लिए सैनेटरी पैड के विज्ञापन बनें तो वह कुछ इसी अंदाज में होंगे। पैडमैन पहले हिस्से में कहानी से ज्यादा डॉक्युमेंट्री का आभास देती है। ज्ञान-दान इसका उद्देश्य है। फिल्म में दिखाया समय रानी मुखर्जी के जमाने का है, जहां देविका रानी के दौर की सोच रखने वालों पर नायक झल्लाया रहता है। पहला हिस्सा उन्हें अच्छा लग सकता है जिन्हें बायोलॉजी के बेसिक नहीं पता लेकिन अगर आपने दुनिया देखी-समझी है तो जरूर लगेगा कि निर्माता-निर्देशक कौन से जमाने में रह रहे हैं!

सिनेमाई स्वतंत्रता के साथ बनाया गया है

फिल्म मूल रूप से तमिलनाडु निवासी पद्मश्री अरुणाचलम मुरुगनाथन के जीवन से प्रेरित है मगर उसे सिनेमाई स्वतंत्रता के साथ बनाया गया है। पैडमैन तीन बहनों के भाई लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) की कहानी है, जो मां और पत्नी (राधिका आप्टे) के साथ रहता है। मासिक धर्म के दिनों में पत्नी के लिए घर से बाहर की गई व्यवस्था उसे नहीं भाती। उसे पता चलता है कि बाजार में बिकने वाले सैनेटरी नैपकिन परिवार खर्च में वहन नहीं किए जा सकते। लक्ष्मीकांत वेल्डिंग की दुकान में हिस्सेदार और कारीगर है। वह तरह-तरह की चीजें बनाता रहता है और पत्नी के लिए सैनेटरी पैड भी तैयार करता है। परंतु उसके प्रयोग विफल होते हैं। सैनेटरी पैड बनाने को वह चैलेंज की तरह लेता है और उसकी यही सनक उसे तथा परिवार की महिलाओं को मुश्किल में डालती है। मां-बहनें उसे छोड़ जाती है, पत्नी को मायके वाले ले जाते हैं। मगर लक्ष्मीकांत की जिद नहीं टूटती। वह कस्बे से बाहर निकल सैनेटरी नैपकिन बनाने के गुर सीखते हुए अंततः ऐसी मशीन ईजाद करता है जो मात्र दो रुपये में पैड तैयार करती है। लक्ष्मीकांत के जीवन में तबलावादक परी (सोनम कपूर) आती है, जिसके पिता आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर हैं। परी के कारण लक्ष्मीकांत द्वारा ईजाद मशीन को दिल्ली में राष्ट्रीय पुरस्कार मिलता है और धीरे-धीरे वह गांवों-कस्बों की महिलाओं को सस्ती दर पर सैनेटरी पैड मुहैया कराने के मिशन में लग जाता है। तब उसे संयुक्त राष्ट्र में भाषण देने के लिए बुलाया जाता है, जहां वह अपनी ‘लिंग्लिश’ (लक्ष्मीकांत की टूटी-फूटी इंग्लिश) से सबका मन मोह लेता है। आखिर में उसे पद्मश्री मिलती है और घरवालों, कस्बेवालों को अपनी गलती का एहसास होता है।

पैडमैन का दूसरा हिस्सा फिल्म की तरह मालूम पड़ता है और यहां अक्षय फॉर्म में हैं। खास तौर पर संयुक्त राष्ट्र में उनका भाषण। लेखक-निर्देशक भले निराश करें परंतु अक्षय अपने अभिनय से कमियों की भरपाई करते हैं। उन्हीं की वजह से फिल्म देखने योग्य बनी है। लक्ष्मीकांत अक्षय के बेहतरीन किरदारों में से है। फैन्स उन पर गर्व करेंगे। वहीं राधिका आप्टे और सोनम कपूर अपनी भूमिकाओं में जमी हैं। खास तौर पर सोनम अपने काम से बताती हैं कि वह अभिनय को मांज रही हैं। आर. बाल्कि दृश्यों को सहजता से नहीं रच सके। उन पर एजेंडा हावी रहा। यह सच है कि हमें ऐसी फिल्मों की जरूरत है, जो समाज को बेहतर बनाएं लेकिन जरूरी है कि फिल्मकार उन्हें लिखने-रचने में मेहनत करें। किरदारों के साथ देश-काल-परिस्थितियों को सही ढंग से बुनें। सितारे की हैसियत के भरोसे न रहें।
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