अपनी फिल्म के बारे में बात करते हुए, अशोक कुमार चट्टोपाध्याय ने कहा कि 'एन ओड टू क्विट्यूड' माइम उस्ताद और भारतीय माइम के प्रतिपादक, जोगेश दत्ता की पर जीवनी पर आधारित है। फिल्म में उनके संघर्ष से लेकर विश्व प्रसिद्ध माइम कलाकार बनने तक का सफर दिखाया गया है। उन्होंने कहा, 'जोगेश दा ने अपने माता-पिता को लगभग 13-14 साल की उम्र में खो दिया। स्वतंत्रता के भोर में, उन्होंने खुद को सियालदह स्टेशन पर तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के एक दरिद्र शरणार्थी के रूप में पाया। उन्होंने होटल, टी स्टॉल वर्कर जैसे कई काम किए हैं और जीवन के बहुत सारे अनुभव एकत्र किए हैं। अपने गहन अवलोकन के माध्यम से उन्होंने दूसरों की नकल करने का कौशल विकसित किया। उनका सेंस ऑफ ह्यूमर भी गजब का था। उन्होंने खुद बहुत सारी स्क्रिप्ट विकसित की। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी माइम कला को अपने दम पर विकसित किया। उनके कई घंटो के अभ्यास ने उन्हें एक लीजेंड बना दिया।' माइम वादक के साथ अपने लंबे जुड़ाव को याद करते हुए उन्होंने कहा, 'जोगेश दत्ता का अपनी कला के प्रति समर्पण वास्तव में अद्भुत है। उन्होंने अपने शरीर को एक मंदिर की तरह माना और एक सख्त आहार और दैनिक दिनचर्या का पालन किया। आजकल ज्यादातर लोगों में उस तरह का समर्पण गायब है।'
अशोक कुमार चट्टोपाध्याय ने कहा, 'मोबाइल और इंटरनेट की दीवानगी के कारण लोग स्टेज एक्टिविटी को भूल रहे हैं। मंच कला देखने के लिए पहले की तरह सभागार में भीड़ नहीं आ रही है। हम सभागार के उद्देश्य से कला बना रहे हैं। ढाई इंच की मोबाइल स्क्रीन कलाकृति के साथ न्याय नहीं कर सकती। मेरे लिए यह माध्यम नहीं है। यदि आप गीत, संगीत या नाटक देखना चाहते हैं तो आपको सभागार जाना होगा।' यह फिल्म स्थानीय समारोहों में स्टैंडअप कॉमेडियन से लेकर भारत में पहली माइम अकादमी स्थापित करने वाले जोगेश दत्ता की यात्रा के बारे में है। बता दें कि अशोक कुमार चट्टोपाध्याय फिल्मों और विज्ञापनों के निर्देशक हैं। उन्होंने कोलकाता नगर निगम, अरोड़ा फिल्म निगम और संगीत नाटक अकादमी के लिए फिल्मों का निर्देशन भी किया है, उनकी फिल्मो में ए डिवाइन पर्क्यूशन (2015), गहना बोरी (2016) और द गोल्डन ग्लोरी (2017) शामिल हैं।