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Exclusive : गरीबी का दुख जानता हूं, रेंगकर यहां तक पहुंचा हूं : रवि किशन

Mon, 03 Oct 2016 04:06 PM IST
अमित कर्ण/ अमर उजाला, मुंबई ब्यूरो
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रवि किशन
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प्रश्न : अपने घर से जब आप एक्टर बनने का सपना लेकर मुंबई आए तो वह जर्नी कैसी रही? 
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उत्तर : हमने बहुत स्ट्रग्ल किया। वह तो खैर हर किसी को करना पड़ता है। लोग चलकर आते हैं, हम रेंगकर आए हैं। हम जब आए थे, तब यह बंबई हुआ करता था। अब मुंबई है। लिहाजा तब के दिनों में भी बड़ी कमाल की जर्नी थी। रामलीलाओं में सीता बनता था। गरीब ब्राह्मण का लड़का था। पापा को यह सब पसंद नहीं था। वे कहा करते कि नचनिया बनबे का रे। वे चाहते थे कि मैं खेती करूं, सरकारी नौकरी करूं, दूध बेचूं। मेरा उन चीजों में दिल नहीं लगता था। डांस-वांस में ही मुझे मजा आता था। गॉड गिफ्ट था मुझमें। मैं इस राह पर चलता गया। उसमें वक्त लगा। 

काफी संघर्ष किया। उसने मुझे जमीनी बनाने में काफी मदद की। यार-दोस्त बोलते भी हैं कि तू इतना जमीन से जुड़ा कैसे है? मैं वही वजह बताता हूं कि मैंने लाइफ को बहुत करीब से देखा है। भूख क्या होती है? परिवार की चिंता, माता-पिता, भाइयों और बहनों की खुद की, पत्नी और अपने बच्चों की, दूसरों का दुख। एक इंडस्ट्री की रचना, ताकि बहुत सारे लोगों को रोजी-रोटी मिले। विजन बहुत बड़ा रखना। बचपन से सोच कभी छोटी नहीं रही। तभी तो सही कहते हैं न कि सपना बड़ा देखना चाहिए तभी आप उसे पूरा करने की कोशिश करते हैं। मुझ में शुरू से यह बात थी। तभी आज मैं आप के सामने इंटरव्यू दे रहा हूं। 
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मिथुन दादा के साथ फिल्में कीं

रवि किशन
प्रश्न : मुंबई में पहला मेजर ब्रेक कौन सा रहा? सर्वाइवल के लिए आपने क्या कुछ किया?

उत्तर : एक छोटी फिल्म मिली थी पितांबर। उसके बाद भी स्ट्रग्ल का दौर काफी लंबा चला। उस फिल्म की कमाई से एक सेकेंड हैंड मोटरसाइकिल खरीदी। अपना फोटो लेकर निर्माताओं के दफ्तर के चक्कर काटे। फोटो सेशन का पैसा भी नहीं था। एक ही फोटो थी। मेले में खिचवाई थी। वही लेकर घूमता रहता था। बरसात में एक बार तो वह भीग भी गई। बहरहाल साउथ के एक अच्छे डायरेक्टर मिल गए केवी राजू। उन्होंने हमें उधार की जिंदगी नामक फिल्म दी। काजोल थीं उस फिल्म में। वहां से जर्नी रफ्तार पकड़ती चली गई। उसके बाद शाहरुख संग आर्मी की।

मिथुन दादा के साथ फिल्में कीं। अक्षय कुमार के साथ फिल्में कीं। सैफ अली खान के साथ फिल्म की। एक फिल्म अच्छी मिली सलमान खान के साथ वो थी तेरे नाम। उसके लिए बेस्ट सपो‌र्टिंग एक्टर के नेशनल अवार्ड के लिए नाम गया। फिर एक भोजपुरी फिल्म मिल गई 2001 में। 'सइयां हमार'। मोहन जी प्रसाद की। मैंने कर ली क्योंकि उन दिनों भोजपुरी में फिल्में नहीं बन रही थीं। उन्हें हीरो नहीं मिल रहा था। उनका बजट मात्र 75,000 रुपए था। मैंने कर ली। वह फिल्म ब्लॉक बस्टर हो गई। 

उसके एक महीने बाद और निर्माता आए। हालांकि मुझे हिंदी फिल्में करनी थीं, मगर जब वह सइयां हमार हिट हुई तो लगा कि भोजपुरी अपनी भाषा है। इसे क्यों न और सजाऊं? फिर ग्लैमर के लिए नगमा जी आईं। रंभा आईं। जीपी सिप्पी साहब भी फिल्म निर्माण में आए। बच्चन साहब आए। उनके संग 'गंगा' में काम किया। 'गंगा' गोल्डन जुबली हुई। 'कब हुई गउना हमार' को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। 'जरा देब दुनिया तोहरा प्यार में' कांस फिल्म फेस्टिवल में गई तो इतिहास रच गया। फिर इसने एक इंडस्ट्री का रूप लिया। दिनेश आए। खेसारी आए। मनोज तिवारी आए। पवन सिंह आए। अनगिनत हीरो और हीरोइन आईं। आज 50,000 से ज्यादा टेक्नीशियन हैं इंडस्ट्री में। उनका चूल्हा जल रहा है। फिर हम तेलुगू और तमिल फिल्मों में चले गए। बिग बॉस किया। काफी पॉपुलैरिटी मिली हमें।

प्रश्न : साउथ की फिल्मों को लेकर यह कहा जाता है कि एक एक्टर वहां का रुख तब करता है, जब उसके पास हिंदी में काम नहीं होता है। आपने ने मगर भोजपुरी में पीक पर रहते हुए वहां का रुख किया। जो भी किरदार मिले उनमें अपनी धाक जमा दी। वहां जिस किस्म का पेशेवर अंदाज है। वक्त को लेकर कमाल की पंक्चुएलिटी है। कैसे देखते हैं इसे?

उत्तर : वे लोग सिनेमा को जीते हैं। शादी भी नाम के लिए करते हैं। उनमें इतना मैडनेस है। ऑफिस में ही सो जाते हैं। पार्टियों में ड्रिंक भी करते हैं तो आपस में सिनेमा ही डिसकस करते हैं। वॉशरूम तक में वही करते होंगे वो लोग। इतना पागलपन है वहां। सिनेमा वहां सेलिब्रेशन है। रिलिजन है। वहां के लोग रात के 2.30-3 बजे से अपने सुपरस्टार के लिए लाइन में खड़े होकर टिकट लेते हैं। कभी कहीं और के लिए ऐसा सुना है। बाहुबली बनाते हैं वो लोग। पूरी दुनिया को चौंका देते हैं। 
 
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पॉपुलैरिटी भोजपुरी में बहुत ज्यादा

रवि किशन
प्रश्न : आप की पॉपुलैरिटी भोजपुरी में बहुत ज्यादा है, इतनी हिंदी सिने सितारों की भी नहीं होती। आपने जबकि हिंदी फिल्में भी कीं वो भी सलमान खान जैसे स्टार के साथ। फिर भी आप लीड रोल से दूर होते चले गए। इसकी क्या वजह है ?

उत्तर : हिंदी भाषियों के साथ ऐसा होता है। उन्हें लीड रोल आसानी से नहीं मिलते। हालांकि अब नवाज, इरफान उस मिथक को तोड़ रहे हैं। मुझे लगता है, वह समय भी बहुत जल्द आ जाएगा, जब लीड रोल भी मिलने शुरू हो जाएंगे। उसके लिए मैं शरीर पर काम भी कर रहा हूं। सिक्स पैक एब बना रहा हूं। फीजिक को लीन बना रहा हूं। अब मेरा फोकस साउथ और हिंदी फिल्मों पर है। मैं भोजपुरी महज तीन या चार कर रहा हूं। पहले करीब 10 कर लेता था एक साल में।

अब मेरा अटैक होगा कि हिंदी और साउथ की फिल्मों में मैं कैसे छा जाऊं? साउथ में शिवा रेड्डी के नाम से मेरा क्रेज हो गया है। आप लोग बहुत प्यार देते हैं। आप लोगों की वजह से मैं यहां तक पहुंच पाया हूं। मैं इस जमीन को हमेशा अपनी सेवाएं देता रहूंगा। भोजपुरी समाज और इस देश की जनता जनार्दन को आखिरी सांस तक एंटरटेन करता रहूंगा। मैं हर बार नए रूप के साथ आता रहूंगा, क्योंकि  मेरे शरीर में अनगिनत लोग रहते हैं। 

आपने मुझे राम में भी देखा। बुलेट राजा में सुमेर यादव बन जाता हूं। श्याम बेनेगल जी की फिल्म में कुछ अलग हूं। 1971 में फौजी हूं। आज बहुत अच्छा लग रहा है। अभी भोजपुरी फिल्म 'जोड़ी नंबर वन' हिट रही है। उसके लिए बिहार वासियों का शुक्रिया अदा करता हूं। अब इसके बाद होम प्रॉडक्‍शन की मेहरारू करने जा रहा हूं। एक डॉक्युमेंट्री सरीखी फिल्म भी है जिसका नाम 'लौंडा डांस पर है'। वह मैं खुद प्रोड्यूस करूंगा। बिहार के एक लड़के की कहानी है। उसका परिवार है। उसके भरण-पोषण के लिए वह कैसे गांव-गांव और शहर-शहर जाकर नाचकर पैसे कमाता है, यह फिल्म उस पर है। 


प्रश्न : भोजपुरी फिल्मों की स्थिति पर क्या कहना चाहेंगे? निर्माता कहते हैं कि वे दर्शकों की पसंद के हिसाब से फिल्में बना रहे हैं। दर्शकों की दलील है कि उन्हें 'नदिया के पार' जैसे स्तर की भोजपुरी फिल्में तो मिलती ही नहीं। ऐसे में भोजपुरी फिल्मों के कंटेंट के लिए कौन जिम्मेवार है?

उत्तर : मेरी कोशिश रहती है कि अच्छी फिल्में बनाऊं। हालांकि बाकी 80-90 प्रतिशत फिल्में अच्छी नहीं आतीं। मनोरंजन का छौंका लगाने के चक्कर में पूरी दाल ही मसालेदार हो जाती है। डांस नंबर वगैरह से फिल्म ढंग की बन नहीं पाती। सलमान खान की फिल्में देख लें। उनकी फिल्मों में तो किस भी नहीं होता। फिर भी फिल्में ब्लॉकबस्टर हो जाती हैं। लिहाजा हमें अभी स्टोरी और स्क्रीनप्ले पर और काम करना बाकी है। हमारे लेखकों को काम करना होगा। मैं भी मां की पेट से सीख कर तो नहीं आया। नतीजतन मैंने सभी किस्म का सिनेमा देखना शुरू किया। अब हम इजरायली, ईरानी सिनेमा और चाइनीज सिनेमा देखते हैं। रोज 8 से 10 अखबार चाट जाते हैं। तो इन सबसे काफी ग्रोथ हुई है।



 
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