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EXCLUSIVE: रहमान बोले, फिर ना होगा कोई लता मंगेशकर जैसा गाने वाला, डीएसपी और संतोष आनंद ने भी किया याद

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ए आर रहमान, लता मंगेशकर - फोटो : सोशल मीडिया
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लता मंगेशकर के अपने करोड़ों चाहने वालों को अलविदा कह देने का दुख लोगों से संभाला नही जा रहा। मुंबई में ब्रीच कैंडी अस्पताल से लेकर उनके घर तक सड़क के दोनों और लोगों का मजमा लगने लगा है। गोलोक वासी हो चुकी लता मंगेशकर का पार्थिव शरीर रविवार शाम अग्नि के हवाले होगा। लेकिन, उनके गीत हमेशा हमेशा गूंजते रहेंगे। पांच पीढ़ियों को अपने गानों से सराबोर करने वाली लता मंगेशकर के साथ काम करने वाले संगीत के कुछ साधकों को ने ‘अमर उजाला’ से बातचीत में उन्हें दिल से याद किया और श्रद्धा सुमन अर्पित किए।

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लताजी जैसा गाने वाला ना कोई हुआ है और न होगा
ए आर रहमान
लता जी के साथ मेरा पहला गाना ‘जिया जले था..’। उनके पास होना भी किसी सपने जैसा होता है। मुझे जहां तक पता है मेरे पिताजी के पास युवा लता मंगेशकर की एक फोटो थी। इस फोटो को वह रोज सुबह उठकर देखते थे। संगीत की प्रेरणा के लिए। किसी भी तरह के गायन का वह शिखर रही हैं। लताजी जैसा गाने वाला ना कोई हुआ है और न होगा। अभी हम लोगों को क्या क्या नहीं करना पड़ता। ड्रेस बदलो, मेकअप करो, म्यूजिक वीडियो शूट करो, यहां स्टेज पर उछलकूद करो, वहां नाचो। लेकिन, उन्होंने क्या किया, कुछ नहीं। सिर्फ संगीत की साधना की। पूरा जीवन उन्होंने संगीत को दे दिया। विश्व में संगीत की प्रेरणा मानी जाती हैं वह। एक तरह से देखा जाए तो लता मंगेशकर के साथ काम करके मैंने अपने पिताजी का सपना पूरा किया।

उनके गानों की सादगी ही संगीत की आत्मा है
देवी श्री प्रसाद, संगीतकार
लता मंगेशकर जी के गायन से मेरा परिचय मेरे पिता (गंधम सत्यमूर्ति) ने कराया। उन्होंने तमाम सारी दक्षिण भारतीय फिल्में लिखी हैं। बचपन से ही मैं उनके साथ लता मंगेशकर के गाने सुनता रहा हूं। और सच कहूं तो इन गानों को सुनकर ही संगीत की तरफ मेरी रुचि बढ़ी। लता मंगेशकर के गानों को सुनकर बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उनके गानों की सबसे बड़ी बात ये रही कि गाना प्रेम का हो, शरारत का हो, विदाई का हो, जुदाई का हो, उन गानों में एक कविता होती थी। लता जी के गानों का चयन और संगीतकारों के साथ जमी उनकी संगत बेमिसाल है। अब भी जब मैं किसी नए गाने की धुन बनाता हूं तो मैं तमाम ऐसे ही हिंदी गानों का संदर्भ अपने गीतकारों को देता रहता हूं। मेरा ये मानना है कि गीतों की सादगी ही श्रोताओं का मन जीतती है। लता जी के गानों में एक सादगी होती थी। उनके बोल भी बहुत सहज होते थे जो सीधे श्रोताओं के दिल में उतर जाते थे। और, किसी कलाकार के भीतर ये गुण उसकी अपनी शख्सीयत से ही आता है। आने वाली तमाम पीढ़ियां उनके गाने सुनेंगी तो अफसोस करेंगी कि लता मंगेशकर उनके समय में क्यों नहीं हैँ!

लता जी के साथ नाम जुड़ना ही सबसे बड़ा सौभाग्य
लता मंगेशकर जी के बारे में मैं क्या कहूं। उनके सुरों ने मेरे शब्दों को अमर किया है। उनके नाम के साथ मेरा नाम जुड़ना ही इस जीवन का मेरा सबसे बड़ा सौभाग्य रहा। और, इसके लिए मैं हमेशा लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का शुक्रगुजार रहूंगा। फिल्म ‘प्रेम रोग’ का गाना  ‘ये गलियां ये चौबारा यहां आना ना दोबारा’ हो या ‘इक प्यार का नगमा’ हो फिल्म ‘शोर’ से। कितने गीत होते हैं जो बस कागजों में लिखे रह जाते हैं। लेकिन लता जी ने इन्हें गाया तो दुनिया ने मुझे भी जाना। मेरा काव्य जीवन कभी उनकी इस वाणी से उऋण नहीं हो सकेगा।
संतोष आनंद, गीतकार
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जब नाम सुनकर छूट गया था पसीना
डैनी
संगीतकार सचिन देव बर्मन के घर मेरा आना जाना उन दिनों खूब होता था। कम लोगों को ही पता है कि मैंने तमाम मशहूर गायकों को अपना आदर्श मानकर गाना सीखा है। मेरा सपना था कि एस डी बर्मन के संगीतबद्ध किसी गाने में मौका मिले। ये सपना जल्द ही पूरा भी हुआ। एक दिन दादा ने कि वह मेरी आवाज में एक गाना रिकॉर्ड करने जा रहे हैं। मैंने उनके पैर छुए और चलने लगा। तो दादा ने कि ये गाना तुम्हें लता मंगेशकर के साथ गाना है। यूं लगा कि किसी ने पैरों के नीचे से जमीन खींच ली हो। मैं खुद को हवा में तैरता महसूस तो कर ही रहा था लेकिन पूरे बदन से एक साथ पसीना भी छूट गया। तब मैं बड़ी मुश्किल से नाम भी दोहरा पाया था, ‘लता मंगेशकर!’
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